Abbas Qamar Shayari Collection

दोस्तो, स्वागत है आपका एक नए शायरी कलेक्शन पोस्ट में। आज की पोस्ट "Abbas Qamar Shayari Collection" उन पाठकों के लिए ख़ास है जो गहरी सोच और ख़ूबसूरत अलफ़ाज़ की तलाश में हैं। अब्बास क़मर की शायरी में मोहब्बत, दर्द और ज़िंदगी के एहसासात बख़ूबी झलकते हैं और वे नए दौर की एक बुलंद आवाज़ हैं। जब मैंने उन्हें पहली बार सुना तो पहली नज़र में ही उनकी शायरी ने मेरे दिल में घर कर लिया। तो इस ब्लॉग पोस्ट में मैं उनकी चुनिंदा शायरी का संग्रह पेश कर रहा हूँ जो हर शायरी प्रेमी के दिल को छू लेगी।

अब्बास क़मर की ग़ज़लें

1
सामने वाले को हल्का जान कर भारी हैं आप आप का मे'यार देखा कितने मे'यारी हैं आप सारे दरिया सब समुंदर मुंतज़िर हैं आप के जाइए बहिए मिरी आँखों से क्यों जारी हैं आप उफ़ तलक करते नहीं ज़िल्ल-ए-इलाही के ख़िलाफ़ आप को दरबार की 'आदत है दरबारी हैं आप आप की आज़ादियाँ हैं आप ही के हाथ में जिस पे क़ुदरत भी है नाज़ाँ वो गिरफ़्तारी हैं आप जिस्म के पिंजरे में ले कर घूमिए नन्ही सी जान चंद साँसों की मिरे प्यारे अदाकारी हैं आप - अब्बास क़मर
2
तेरी आगोश में सर रक्खा सिसक कर रोए मेरे सपने मेरी आँखों से छलक कर रोए सारी ख़ुशियों को सरे आम झटक कर रोए हम भी बच्चों की तरह पाँव पटक कर रोए रास्ता साफ़ था मंज़िल भी बहुत दूर न थी बीच रस्ते में मगर पाँव अटक कर रोए जिस घड़ी क़त्ल हवाओं ने चराग़ों का किया मेरे हमराह जो जुगनू थे फफक कर रोए क़ीमती ज़िद थी ग़रीबी भी भला क्या करती माँ के जज़्बात दुलारों को थपक कर रोए अपने हालात बयाँ करके जो रोई धरती चाँद तारे किसी कोने में दुबक कर रोए बा-मशक्कत भी मुकम्मल न हुई अपनी ग़ज़ल चंद नुक्ते मेरे काग़ज़ से सरक कर रोए  - अब्बास क़मर 
3
जहाँ सारे हवा बनने की कोशिश कर रहे थे वहाँ भी हम दिया बनने की कोशिश कर रहे थे हमें ज़ोर-ए-तसव्वुर भी गँवाना पड़ गया हम तसव्वुर में ख़ुदा बनने की कोशिश कर रहे थे ज़मीं पर आ गिरे जब आसमाँ से ख़्वाब मेरे ज़मीं ने पूछा क्या बनने की कोशिश कर रहे थे उन्हें आँखों ने बेदर्दी से बे-घर कर दिया है ये आँसू क़हक़हा बनने की कोशिश कर रहे थे हमें दुश्वारियों में मुस्कुराने की तलब थी हम इक तस्वीर सा बनने की कोशिश कर रहे थे  - अब्बास क़मर 
4
उसकी पेशानी पे जो बल आए दो-जहाँ में उथल-पुथल आए ख़्वाब का बोझ इतना भारी था नींद पलकों पे हम कुचल आए इस क़दर जज़्ब हो गए दोनों दर्द खेंचूँ तो दिल निकल आए रूह का नंगापन छिपाने को जिस्म कपड़े बदल बदल आए जिस पे हर चीज़ टाल रक्खी है जाने किस रोज़ मेरा कल आए गुलमोहर की तलाश थी मुझको मेरे हिस्से मगर कंवल आए  - अब्बास क़मर 
5
अश्कों को आरज़ू-ए-रिहाई है रोइए आँखों की अब इसी में भलाई है रोइए रोना इलाज-ए-ज़ुल्मत-ए-दुनिया नहीं तो क्या कम-अज़-कम एहतिजाज-ए-ख़ुदाई है रोइए तस्लीम कर लिया है जो ख़ुद को चराग़-ए-हक़ दुनिया क़दम क़दम पे सबाई है रोइए ख़ुश हैं तो फिर मुसाफ़िर-ए-दुनिया नहीं हैं आप इस दश्त में बस आबला-पाई है रोइए हम हैं असीर-ए-ज़ब्त इजाज़त नहीं हमें रो पा रहे हैं आप बधाई है रोइए  - अब्बास क़मर 
अब्बास क़मर साहब की ये ग़ज़ल मुझे बहुत ज़ियादा पसंद आई। आप उनके तख़य्युल का मेयार देख सकते हैं। बेहद ही ख़ूबसूरत रदीफ़ पर कमाल की ग़ज़ल कह दी। यह एक classical ghazal का नमूना है।  

6
लम्हा-दर-लम्हा तिरी राह तका करती है एक खिड़की तिरी आमद की दुआ करती है सिलवटें चीख़ती रहती हैं मिरे बिस्तर की करवटों में ही मिरी रात कटा करती है वक़्त थम जाता है अब रात गुज़रती ही नहीं जाने दीवार-घड़ी रात में क्या करती है चाँद खिड़की में जो आता था नहीं आता अब तीरगी चारों तरफ़ रक़्स किया करती है मेरे कमरे में उदासी है क़यामत की मगर एक तस्वीर पुरानी सी हँसा करती है  - अब्बास क़मर 
7
हम ऐसे सर-फिरे दुनिया को कब दरकार होते हैं अगर होते भी हैं बे-इंतिहा दुश्वार होते हैं ख़मोशी कह रही है अब ये दो-आबा रवाँ होगा हवा चुप हो तो बारिश के शदीद आसार होते हैं ज़रा सी बात है इस का तमाशा क्या बनाएँ हम इरादे टूटते हैं हौसले मिस्मार होते हैं शिकायत ज़िंदगी से क्यूँ करें हम ख़ुद ही थम जाएँ जो कम-रफ़्तार होते हैं वो कम-रफ़्तार होते हैं गले में ज़िंदगी के रीसमान-ए-वक़्त है तो क्या परिंदे क़ैद में हों तो बहुत हुश्यार होते हैं जहाँ वाले मुक़य्यद हैं अभी तक अहद-ए-तिफ़्ली में यहाँ अब भी खिलौने रौनक़-ए-बाज़ार होते हैं गुलू-ए-ख़ुश्क उन को भेजता है दे के मश्कीज़ा कुछ आँसू तिश्ना-कामों के अलम-बरदार होते हैं बदन उन को कभी बाहर निकलने ही नहीं देता 'क़मर-अब्बास' तो बा-क़ाएदा तय्यार होते हैं  - अब्बास क़मर 
8
क्यों ढूँढ़ रहे हो कोई मुझसा मेरे अंदर कुछ भी न मिलेगा तुम्हें मेरा मेरे अंदर गहवार-ए-उम्मीद सजाए हुए हर रोज़ सो जाता है मासूम सा बच्चा मेरे अंदर बाहर से तबस्सुम की क़बा ओढ़े हुए हूँ दरअस्ल हैं महशर कई बरपा मेरे अंदर ज़ेबाइशे-माज़ी में सियह-मस्त सा इक दिल देता है बग़ावत को बढ़ावा मेरे अंदर सपनों के तआक़ुब में है आज़ुरदः हक़ीक़त होता है यही रोज़ तमाशा मेरे अंदर मैं कितना अकेला हूँ तुम्हें कैसे बताऊँ तन्हाई भी हो जाती है तन्हा मेरे अंदर अंदोह की मौजों को इन आँखों में पढ़ो तो शायद ये समझ पाओ है क्या क्या मेरे अंदर  - अब्बास क़मर 
9
मेरी परछाइयाँ गुम हैं मेरी पहचान बाक़ी है सफ़र दम तोड़ने को है मगर सामान बाक़ी है अभी तो ख़्वाहिशों के दरमियाँ घमसान बाक़ी है अभी इस जिस्म-ए-फ़ानी में ज़रा सी जान बाक़ी है इसे तारीकियों ने क़ैद कर रक्खा है बरसों से मेरे कमरे में बस कहने को रौशनदान बाक़ी है तुम्हारा झूट चेहरे से अयाँ हो जाएगा इक दिन तुम्हारे दिल के अंदर था जो वो शैतान बाक़ी है गुज़ारी उम्र जिसकी बंदगी में वो है ला-हासिल अजब सरमाया-कारी है नफ़ा-नुक़सान बाक़ी है अभी ज़िंदा है बूढ़ा बाप घर की ज़िन्दगी बनकर फ़क़त कमरे जुदा हैं बीच में दालान बाक़ी है ग़ज़ल ज़िंदा है उर्दू के अदब-बरदार ज़िंदा हैं हमारी तरबीयत में अब भी हिंदोस्तान बाक़ी है  - अब्बास क़मर 
10
हालत-ए-हाल से बेगाना बना रक्खा है ख़ुद को माज़ी का निहाँ-ख़ाना बना रक्खा है ख़ौफ़-ए-दोज़ख़ ने ही ईजाद किया है सज्दा डर ने इंसान को दीवाना बना रक्खा है मिम्बर-ए-इश्क़ से तक़रीर की ख़्वाहिश है हमें दिल को इस वास्ते मौलाना बना रक्खा है मातम-ए-शौक़ बपा करते हैं हर शाम यहाँ जिस्म को हम ने अज़ाँ-ख़ाना बना रक्खा है वक़्त-ए-रुख़्सत है मिरे चाहने वालों ने भी अब साँस को वक़्त का पैमाना बना रक्खा है जानते हैं वो परिंदा है नहीं ठहरेगा हम ने उस दिल को मगर दाना बना रक्खा है  - अब्बास क़मर 
ये तो थीं अब्बास क़मर की चुनिंदा ग़ज़लें लेकिन Abbas Qamar shayari collection बिना उनके तन्हा अश'आर के अधूरा ही रह जाएगा। तो चलिए, अब हम उनके कुछ अश'आर भी पढ़ते हैं।

अब्बास क़मर के अश'आर 

हम आसमाँ के लोग थे जन्नत से आए थे ख़ुद को मगर ज़मीं में बोना पड़ा हमें  - अब्बास क़मर 
जहाँ सारे हवा बनने की कोशिश कर रहे थे वहाँ भी हम दिया बनने की कोशिश कर रहे थे  - अब्बास क़मर 
आपकी सादा दिली ख़ुद आपकी तौहीन है हुस्न वालों को ज़रा मग़रूर होना चाहिए  - अब्बास क़मर 
किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है  - अब्बास क़मर 
ख़ुश हैं तो फिर मुसाफ़िर-ए-दुनिया नहीं हैं आप इस दश्त में बस आबला-पाई है रोइए - अब्बास क़मर
चुना है तूने मुझे ज़िन्दगी के दामन में मुझे ये लोग तेरा इंतिख़ाब कहते हैं  - अब्बास क़मर 
वो सवाल जिसका जवाब है मेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी का सवाल है ये सवाल है  - अब्बास क़मर 
कट गई उम्र हमारी ये शिकायत करते अपने जैसा कोई मिलता तो मुहब्बत करते  - अब्बास क़मर 
दोस्तो उम्मीद करता हूँ कि आपको ये पोस्ट "Abbas Qamar Shayari Collection" पसंद आई होगी। आप हमारे ब्लॉग पर इसी तरह और भी नई और बुलंद आवाज़ों को पढ़ सकते हैं। अंत तक बने रहने के लिए आपका शुक्रिया।

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