दोस्तो, आज हम जिस शायर के कलाम पढ़ने वाले हैं उनका नाम है अम्मार इक़बाल। इनकी शायरी में रिवायात और ताज़ा ख़यालात का एक ख़ूबसूरत संगम देखने को मिलता है। ये पाकिस्तान से आते हैं लेकिन अपनी शायरी से इन्होंने दुनिया के कोने-कोने में अपनी पहचान बनाई है। आज की पोस्ट "Ammar Iqbal Shayari Collection" में हम उनके कलाम से रू-ब-रू होंगे। पहले हम अम्मार इक़बाल साहब की ग़ज़लें पढ़ेंगे और फिर चंद नज़्में।
अम्मार इक़बाल की ग़ज़लें
1
अक्स कितने उतर गए मुझ में
फिर न जाने किधर गए मुझ में
मैं ने चाहा था ज़ख़्म भर जाएँ
ज़ख़्म ही ज़ख़्म भर गए मुझ में
मैं वो पल था जो खा गया सदियाँ
सब ज़माने गुज़र गए मुझ में
ये जो मैं हूँ ज़रा सा बाक़ी हूँ
वो जो तुम थे वो मर गए मुझ में
मेरे अंदर थी ऐसी तारीकी
आ के आसेब डर गए मुझ में
पहले उतरा मैं दिल के दरिया में
फिर समुंदर उतर गए मुझ में
कैसा मुझ को बना दिया 'अम्मार'
कौन सा रंग भर गए मुझ में
- अम्मार इक़बाल 2
रंग-ओ-रस की हवस और बस
मसअला दस्तरस और बस
यूँ बुनी हैं रगें जिस्म की
एक नस टस से मस और बस
सब तमाशा-ए-कुन ख़त्म शुद
कह दिया उस ने बस और बस
क्या है माबैन-ए-सय्याद-ओ-सैद
एक चाक-ए-क़फ़स और बस
उस मुसव्विर का हर शाहकार
साठ पैंसठ बरस और बस
- अम्मार इक़बाल 3
मुझ से बनता हुआ तू तुझ को बनाता हुआ मैं
गीत होता हुआ तू गीत सुनाता हुआ मैं
एक कूज़े के तसव्वुर से जुड़े हम दोनों
नक़्श देता हुआ तू चाक घुमाता हुआ मैं
तुम बनाओ किसी तस्वीर में कोई रस्ता
मैं बनाता हूँ कहीं दूर से आता हुआ मैं
एक तस्वीर की तकमील के हम दो पहलू
रंग भरता हुआ तू रंग बनाता हुआ मैं
मुझ को ले जाए कहीं दूर बहाती हुई तू
तुझ को ले जाऊँ कहीं दूर उड़ाता हुआ मैं
इक इबारत है जो तहरीर नहीं हो पाई
मुझ को लिखता हुआ तू तुझ को मिटाता हुआ मैं
मेरे सीने में कहीं ख़ुद को छुपाता हुआ तू
तेरे सीने से तिरा दर्द चुराता हुआ मैं
काँच का हो के मिरे आगे बिखरता हुआ तू
किर्चियों को तिरी पलकों से उठाता हुआ मैं
- अम्मार इक़बाल 4
जहल को आगही बनाते हुए
मिल गया रौशनी बनाते हुए
क्या क़यामत किसी पे गुज़रेगी
आख़िरी आदमी बनाते हुए
क्या हुआ था ज़रा पता तो चले
वक़्त क्या था घड़ी बनाते हुए
कैसे कैसे बना दिए चेहरे
अपनी बे-चेहरगी बनाते हुए
दश्त की वुसअ'तें बढ़ाती थीं
मेरी आवारगी बनाते हुए
उस ने नासूर कर लिया होगा
ज़ख़्म को शायरी बनाते हुए
- अम्मार इक़बाल यह भी पढ़िए: Umair Najmi Shayari Collection
5
ख़ुद-परस्ती से इश्क़ हो गया है
अपनी हस्ती से इश्क़ हो गया है
जब से देखा है इस फ़क़ीरनी को
फ़ाक़ा-मस्ती से इश्क़ हो गया है
एक दरवेश को तिरी ख़ातिर
सारी बस्ती से इश्क़ हो गया है
ख़ुद तराशा है जब से बुत अपना
बुत-परस्ती से इश्क़ हो गया है
ये फ़लक-ज़ाद की कहानी है
इस को पस्ती से इश्क़ हो गया है
- अम्मार इक़बाल 6
तख़य्युल को बरी करने लगा हूँ
मैं ज़ेहनी ख़ुद-कुशी करने लगा हूँ
मुझे ज़िंदा जलाया जा रहा है
तो क्या मैं रौशनी करने लगा हूँ
मैं आईनों को देखे जा रहा था
अब इन से बात भी करने लगा हूँ
तुम्हारी बस तुम्हारी दुश्मनी में
मैं सब से दोस्ती करने लगा हूँ
मुझे गुमराह करना ग़ैर-मुमकिन
मैं अपनी पैरवी करने लगा हूँ
- अम्मार इक़बाल 7
रात से जंग कोई खेल नईं
तुम चराग़ों में इतना तेल नईं
आ गया हूँ तो खींच अपनी तरफ़
मेरी जानिब मुझे धकेल नईं
जब मैं चाहूँगा छोड़ जाऊँगा
इक सराए है जिस्म जेल नईं
बेंच देखी है ख़्वाब में ख़ाली
और पटरी पर उस पे रेल नईं
जिस को देखा था कल दरख़्त के गिर्द
वो हरा अज़दहा था बेल नईं
- अम्मार इक़बाल 8
पहले हमारी आँख में बीनाई आई थी
फिर इस के बा'द क़ुव्वत-ए-गोयाई आई थी
मैं अपनी ख़स्तगी से हुआ और पाएदार
मेरी थकन से मुझ में तवानाई आई थी
दिल आज शाम से ही उसे ढूँडने लगा
कल जिस के बा'द कमरे में तन्हाई आई थी
वो किस की नग़्मगी थी जो दारों सरों में थी
रंगों में किस के रंग से रा'नाई आई थी
फिर यूँ हुआ कि उस को तमन्नाई कर लिया
मेरी तरफ़ जो चश्म-ए-तमाशाई आई थी
- अम्मार इक़बाल 9
ज़रा सी देर जले जल के राख हो जाए
वो रौशनी दे भले जल के राख हो जाए
वो आफ़्ताब जिसे सब सलाम करते हैं
जो वक़्त पर न ढले जल के राख हो जाए
मैं दूर जा के कहीं बाँसुरी बजाऊँगा
बला से रोम जले जल के राख हो जाए
वो एक लम्स-ए-गुरेज़ाँ है आतिश-ए-बे-सोज़
मुझे लगाए गले जल के राख हो जाए
कोई चराग़ बचे सुब्ह तक तो तारीकी
उसी चराग़-तले जल के राख हो जाए
- अम्मार इक़बाल 10
जाओ मातम गुज़ारो जाने दो
जिस का ग़म है उसे मनाने दो
बीच से एक दास्ताँ टूटी
और फिर बन गए फ़साने दो
हम फ़क़ीरों को कुछ तो दो साहब
कुछ नहीं दे सको तो ता'ने दो
हाथ जिस को लगा नहीं सकता
उस को आवाज़ तो लगाने दो
तुम दिया हो तो उन पतंगों को
कम से कम रौशनी में आने दो
- अम्मार इक़बाल 11
तीरगी ताक़ में जड़ी हुई है
धूप दहलीज़ पर पड़ी हुई है
दिल पे नाकामियों के हैं पैवंद
आस की सोई भी गड़ी हुई है
मेरे जैसी है मेरी परछाईं
धूप में पल के ये बड़ी हुई है
घेर रक्खा है ना-रसाई ने
और ख़्वाहिश वहीं खड़ी हुई है
मैं ने तस्वीर फेंक दी है मगर
कील दीवार में गड़ी हुई है
हारता भी नहीं ग़म-ए-दौराँ
ज़िद पे उम्मीद भी अड़ी हुई है
दिल किसी के ख़याल में है गुम
रात को ख़्वाब की पड़ी हुई है
- अम्मार इक़बाल 12
वो पैकर-ए-जमाल है कमाल है
वो हुस्न-ए-बे-मिसाल है कमाल है
वो पूछते हैं आप क्यों बदल गए
यही मिरा सवाल है कमाल है
मुझे हराम है शराब का नशा
तुम्हें लहू हलाल है कमाल है
ये माँद पड़ रहा है आफ़्ताब क्यों
ये कुछ दियों की चाल है कमाल है
रक़ीब को बुरा-भला मैं क्यों कहूँ
वो सिर्फ़ हम-ख़याल है कमाल है
- अम्मार इक़बाल 13
बात मैं सरसरी नहीं करता
और वज़ाहत कभी नहीं करता
एक ही बात मुझमें अच्छी है
और मैं बस वही नहीं करता
मुझको कैसे मिले भला फुर्सत
मैं कोई काम ही नहीं करता
आप ही लोग मार देते हैं
कोई भी खुदकुशी नहीं करता
एक जुगनू है तेरी यादों का
जो कभी रौशनी नहीं करता
- अम्मार इक़बाल 14
थक गए हो तो थकन छोड़ के जा सकते हो
तुम मुझे वाक़ि'अतन छोड़ के जा सकते हो
हम दरख़्तों को कहाँ आता है हिजरत करना
तुम परिंदे हो वतन छोड़ के जा सकते हो
तुम से बातों में कुछ इस दर्जा मगन होता हूँ
मुझ को बातों में मगन छोड़ के जा सकते हो
जाने वाले से सवालात नहीं होते मियाँ
तुम यहाँ अपना बदन छोड़ के जा सकते हो
जाना चाहो तो किसी वक़्त भी ख़ुद से बाहर
अपने अंदर की घुटन छोड़ के जा सकते हो
- अम्मार इक़बाल 15
यूँही बे-बाल-ओ-पर खड़े हुए हैं
हम क़फ़स तोड़ कर खड़े हुए हैं
दश्त गुज़रा है मेरे कमरे से
और दीवार-ओ-दर खड़े हुए हैं
ख़ुद ही जाने लगे थे और ख़ुद ही
रास्ता रोक कर खड़े हुए हैं
और कितनी घुमाओगे दुनिया
हम तो सर थाम कर खड़े हुए हैं
बरगुज़ीदा बुज़ुर्ग नीम के पेड़
थक गए हैं मगर खड़े हुए हैं
मुद्दतों से हज़ार-हा आलम
एक उम्मीद पर खड़े हुए हैं
- अम्मार इक़बाल ये तो थीं अम्मार इक़बाल की चुनिंदा ग़ज़लें। मगर अभी भी Ammar Iqbal Shayari Collection अधूरा है क्योंकि हमने अम्मार साहब की नज़्में नहीं पढ़ीं। तो चलिए, अब नज़्मों की तरफ़ बढ़ते हैं।
अम्मार इक़बाल की नज़्में
हेलुसिनेशन
मैं अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ
और इक दीवार पर नज़रें जमाए
मनाज़िर के अजूबे देखता हूँ
उसी दीवार में कोई ख़ला है
मुझे जो ग़ार जैसा लग रहा है
वहाँ मकड़ी ने जाल बुन लिया है
और अब अपने ही जाल में फँसी है
वहीं पर एक मुर्दा छिपकिली है
कई सदियों से जो साकित पड़ी है
अब उस पर काई जमती जा रही है
और उस में एक जंगल दिख रहा है
दरख़्तों से परिंदे गिर रहे हैं
कुल्हाड़ी शाख़ पर लटकी हुई है
लक़ड़हारे पे गीदड़ हँस रहे
मुसलसल तेज़ बारिश हो रही है
किसी पत्ते से गिर कर एक क़तरा
अचानक एक समुंदर बन गया है
समुंदर नाव से लड़ने लगा है
मछेरा मछलियों में घिर गया है
और अब पतवार सीने से लगा कर
वो नीले आसमाँ को देखता है
जो यक-दम ज़र्द पड़ता जा रहा है
वो कैसे रेत बनता जा रहा है
मुझे अब सिर्फ़ सहरा दिख रहा है
और उस में धूम की चादर बिछी है
मगर वो एक जगह से फट रही है
वहाँ पर एक साया नाचता है
जहाँ भी पैर धरता है वहाँ पर
सुनहरे फूल खिलते जा रहे है
ये सहरा बाग़ बनता जा रहा है
और उस में तितलियाँ दिखती हैं
परों में जिन के नीली रौशनी है
वो हर पल तेज़ होती जा रही है
सो मेरी आँख में चुभने लगी है
सो मैं ने हाथ आँखों पर रखे हैं
और अब उँगली हटा कर देखता हूँ
कि अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ
और इक दीवार के आगे खड़ा हूँ
- अम्मार इक़बाल ज़बाँ-दराज़
मैं अपनी बीमारी बताने से मा'ज़ूर हूँ
मुझे ज़बान की अजीब बीमारी हो गई है
सो गुफ़्तुगू से परहेज़ करने पर मजबूर हूँ
मेरा लहजा करख़्त और आवाज़ भारी हो गई है
ज़बान में फ़ी लफ़्ज़ एक इंच इज़ाफ़ा हो रहा है
पहले भी तो ये काँधों पर पड़ी थी
तुम्हें मेरी मुश्किल का अंदाज़ा हो रहा है
तुम जो मुझ से बात करने पर अड़ी थीं
आख़िरी तकरार के बाद मैं ने ज़बान समेट ली है
अब मैं एक लफ़्ज़ भी मज़ीद नहीं बोलूँगा
खींच-तान कर ज़बान अपने बदन पर लपेट ली है
दुआ नहीं करूँगा गिरह नहीं खोलूँगा
हर पस्ली दूसरी पस्ली में धँसती जा रही है
मेरी ज़बान मेरे बदन पर कसती जा रही है
- अम्मार इक़बाल मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं
मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं
मेरे पेच खुल चुके हैं मेरे ख़म बिगड़ रहे हैं
कहीं चुपके चुपके चुपके मेरी बात चल रही है
कहीं कुछ अज़ीज़ मेरे, मेरे पावँ पड़ रहे हैं
मेरा काम कर चुका है, मेरा ख़्वाब मर चुका है
मेरी ख़ुश्क ख़ुश्क आँखों में सराब गड़ रहे हैं
मेरी पसलियाँ चटक कर मेरे मुँह को आ गई हैं
ग़म-ए-तिश्नगी के मारे मेरे दाँत झड़ रहे हैं
मेरी आस्तीं फटी है मुझे चोट लग रही है
मेरी धज्जियाँ उड़ी हैं, मेरे तार उधड़ रहे हैं
मेरे ख़ून की सफ़ेदी तुम्हें क्या बता रही है
ये मुझे जता रही है, मेरे ज़ख़्म सड़ रहे हैें
मेरे सर पे चढ़ के अब तक वही ख़ौफ़ नाचता है
कि तू कब का जा चुका है कि तू कब का जा चुका है
- अम्मार इक़बाल अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है
गुज़रती उम्र ढ़लती जा रही है
ज़मीं पाँव निगलती जा रही है
अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है
परी आगे निकलती जा रही है
सितारे बारी-बारी बुझ रहे हैं
हवा मोअत्तर होती जा रही है
चमकती जा रही है कोई मछली
समंदर बर्फ़ करती जा रही है
मैं अपनी नाव में बेकस पड़ा हूँ
उफकती नब्ज़ डूबी जा रही है
अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है
अँधेरा ही समंदर का ख़ुदा है
ख़ुदा मछली पकड़ना चाहता है
- अम्मार इक़बाल अगर आपको शायरी में सच्चाई और संवेदनशीलता पसंद है, तो Ammar Iqbal Shayari Collection आपको ज़रूर पसंद आया होगा। कॉमेंट बॉक्स में अपनी पसंदीदा ग़ज़ल या शे'र ज़रूर बताएँ। दोस्तो, इसी तरह शायरी पढ़ने के लिए हमारे ब्लॉग पर आते रहें। अंत तक बने रहने के लिए आपका शुक्रिया।
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