Parveen Shakir
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Ghazal
कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की
वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया
पूरा दुख और आधा चाँद
कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी
हम ने ही लौटने का इरादा नहीं किया
अक्स-ए-ख़ुशबू हूँ बिखरने से न रोके कोई
तेरी ख़ुश्बू का पता करती है
अब भला छोड़ के घर क्या करते
टूटी है मेरी नींद मगर तुम को इस से क्या
बहुत रोया वो हम को याद कर के
बादबाँ खुलने से पहले का इशारा देखना
कुछ फ़ैसला तो हो कि किधर जाना चाहिए
अपनी रुस्वाई तिरे नाम का चर्चा देखूँ
गए मौसम में जो खिलते थे गुलाबों की तरह
बख़्त से कोई शिकायत है न अफ़्लाक से है
बिछड़ा है जो इक बार तो मिलते नहीं देखा
बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गए
पा-ब-गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन
रस्ता भी कठिन धूप में शिद्दत भी बहुत थी
धनक धनक मिरी पोरों के ख़्वाब कर देगा
अपनी तन्हाई मिरे नाम पे आबाद करे
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