अपनी तन्हाई मिरे नाम पे आबाद करे
धनक धनक मिरी पोरों के ख़्वाब कर देगा
रस्ता भी कठिन धूप में शिद्दत भी बहुत थी
पा-ब-गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन
ग़म की दौलत मुफ़्त लुटा दूँ बिल्कुल नहीं
अपने ख़ाली-पन को भरना छोड़ दिया
ये ग़म क्या दिल की 'आदत है नहीं तो
तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो
इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं
ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं
नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम
तेरा चेहरा फूल जैसा हो गया
नाराज़गी किसी से जता कर नहीं गया
गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है
आप की याद आती रही रात भर
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
दर्द हल्का है साँस भारी है
दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में