कभी मैं चलूँ कभी तू चले कभी बे-मज़ा ये सफ़र न हो
कभी भी कोई भी ज़ुल्मी मुझे बशर न लगे
मुझे पता नहीं मिरा ज़मीर कितने दर गया
न जाने कितने सवाब होते न जाने कितने ज़लाल होते
गुल-ए-तर भले आप के हो गए
जो मिलती नहीं है वही माँगते हैं
हुआ हर एक से झगड़ा हमारा
वो क्यूँ लोगों के दिल पत्थर बनाता है
मेरी सीरत भी तो मेरी अबस सूरत से मिलती है
मिट गई ख़लिश न जाने कब मुझे नहीं पता
बात बन न पाएगी चंद ईंटें ढहने से
मैं हूँ 'आबिद तो ने’मत से तुम
ज़िन्दगी ने मेरे साथ क्या क्या किया
वो भी राज़ी न था अंजाम पे आने के लिए
हर कोई इतना मुकम्मल क्यों है
ख़ू-ए-दिल वाक़ई सही है मिरी
ज़िंदगी का तर्ज़ मुबहम कर दिया
चंद पैसे ही कमाना चाहता हूँ
गर यही होगा रवैया तो गए तुम काम से
जिस्म पर हर ज़ख़्म का रुतबा तो मरहम तय करेगा
रह रह के मुझे इतना सताती है उदासी
झगड़े भी हुए अक्सर जब हमने मोहब्बत की
ता-उम्र इक भी शख़्स हमारा नहीं हुआ
उसने बस इतना बोला गर रो सको तो रो लो
अपनी मोहब्बत पे कभी पर्दा न कर
रौशन हो के लौट आया है
ऐसा उमूमन तो नहीं होता कि जैसा हो गया