Mirza Ghalib Shayari in Hindi with Explanation

दोस्तो, उर्दू शायरी की जब भी बात होती है तो मिर्ज़ा ग़ालिब के बग़ैर ये मुम्किन ही नहीं। ये एक ऐसा नाम है जिसके बग़ैर शायरी की दुनिया अधूरी है। ग़ालिब उर्दू शायरी के वो उस्ताद शायर हैं जो किसी तआरुफ़ के मोहताज नहीं। मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी में ऐसा पैनापन है कि किसी के भी दिल में घर कर जाती है। लेकिन ग़ालिब की शायरी समझना आसान नहीं बल्कि जो भी शायरी पढ़ने की शुरूआत करता है उसे मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी न पढ़ने की सलाह दी जाती है। ये नए पाठकों को ज़रूर निराश करती है क्योंकि वो शे'र, ग़ज़ल या नज़्म समझे न समझे मगर ग़ालिब को ज़रूर जानता है और उनकी शायरी पढ़ने के लिए उत्सुक रहता है।

हमने इस समस्या को समझा और इसलिए ये पोस्ट तैयार किया जिसमें मिर्ज़ा ग़ालिब के अश'आर मा'नी के साथ समझाए गए हैं। नए पाठकों के लिए ये पोस्ट ग़ालिब साहब की शायरी को समझने का सफ़र आसान कर देगी। अब आपको कहीं भटकने की ज़रुरत नहीं क्योंकि इस पोस्ट में हमने ग़ालिब के अश'आर सरल भाषा में समझाए हैं।

Mirza Ghalib Shayari in Hindi

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले
– मिर्ज़ा ग़ालिब
मिर्ज़ा ग़ालिब इस शे'र में कहते हैं कि हमने ये तो सुना था कि आदम को ख़ुल्द (जन्नत) से निकाला गया था लेकिन इतनी ज़िल्लत तब भी नहीं हुई थी जितनी कि मेरी हुई तुम्हारी गली से निकलते हुए। यहाँ ग़ालिब साहब अपनी महबूबा से शिकायत कर रहे हैं और एक तरह से अपनी आपबीती को बढ़ा-चढ़ा कर बता रहे हैं।
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
– मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ालिब कहते हैं कि जिस तरह एक बूँद के लिए दरिया में मिल जाना सबसे बड़ी ख़ुशी की बात होती है, उसी तरह इंसान के लिए सबसे बड़ी ख़ुशी तब होती है जब वह अपने दुखों को अपना लेता है या अपने दुखों के सामने हार मान लेता है। ऐसा करने पर इंसान अपने दुखों से ऊपर उठ जाता है और उसे इसी अवस्था में आनंद आने लगता है। 
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ
रोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ
– मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ालिब कह रहे हैं कि इंसान का दिल आख़िर दिल ही है, कोई पत्थर या ईंट नहीं कि जो कुछ महसूस ही न कर सके। दिल होता ही है एहसासात को महसूस करने के लिए। ग़ालिब ये बात कर रहे हैं कि समाज में दुख, दर्द या आँसू को कमज़ोरी से जोड़ा जाता है ख़ास कर कि मर्दों को अपने दुख व्यक्त करने की इजाज़त समाज नहीं देता। ग़ालिब साफ़-साफ़ कह रहे हैं कि अगर मुझे किसी ने सताया है, तो मुझे रोने की अनुमति मिलनी चाहिए। इतना तो मेरा हक़ बनता है।
दिल हुआ कशमकश-ए-चारा-ए-ज़हमत में तमाम
मिट गया घिसने में इस उक़दे का वा हो जाना
– मिर्ज़ा ग़ालिब
यह शेर इंसान की हताशा और अंदरूनी टूटन को बयाँ करता है। ग़ालिब कहना चाहते हैं कि किसी परेशानी का हल ढूँढते-ढूँढते एक ऐसा समय आ जाता है जब इंसान का दिल किसी भी चीज़ से ख़ुश नहीं हो पाता, न कुछ करने की इच्छा बचती है और न ही उम्मीद। जिस समाधान की तलाश होती है, वह मिलता भी नहीं। ऐसी स्थिति में इंसान अंदर से पूरी तरह टूट जाता है मगर अपनी समस्या हल नहीं कर पाता। यह शेर उस मानसिक थकान और बेबसी को दर्शाता है जहाँ संघर्ष जारी रहता है, पर ताक़त और हौसला दोनों ख़त्म हो जाते हैं।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ
– मिर्ज़ा ग़ालिब
'मिन्नत-कश' का अर्थ है एहसान तले दब जाना। ग़ालिब कहते हैं कि वो दवा के एहसान तले नहीं दबना चाहते और फ़क़्र के साथ अपने ग़म और दर्द के साथ जीना चाहते हैं। मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी में दवा और दर्द जैसे अल्फ़ाज़ बहुत देखने को मिलते हैं। यहाँ पर ग़ालिब कह रहे हैं कि इंसान को अपनी शर्तों पर शान से जीना चाहिए और किसी का एहसान नहीं लेना चाहिए। 
होता है निहाँ गर्द में सहरा मिरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मिरे आगे
– मिर्ज़ा ग़ालिब
यह एक प्रेरणादायक शे'र है, इसमें ग़ालिब कहते हैं कि अगर इंसान ठान ले तो प्रकृति भी उसे वह सब देती है जो वह चाहता है। यहाँ पर दरिया और सहारा मुश्किलों का प्रतीक है। ग़ालिब कहते हैं कि मेरी शख़्सियत में इतनी ताक़त है कि सहारा भी अपने आप को छुपा लेता है और दरिया भी मिट्टी में अपना सर घिसने लगता है। यह एक प्रकार का इस्तियारा (metaphor) है जिसे मुश्किलों को दर्शाने के लिए इस्तेमाल किया गया है।
जम्अ' करते हो क्यूँ रक़ीबों को
इक तमाशा हुआ गिला न हुआ
– मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ालिब अपनी माशूका से कह रहे हैं कि हमारे बीच जो अनबन है उसका तमाशा दुनिया के सामने क्यों करना जब आपस में ही बात करके अनबन सुलझाई जा सकती है। तमाशा करने से आशिक़ यानी ग़ालिब के दुश्मनों को भी बीच में आने का मौक़ा मिल जाता है जिससे ग़ालिब डरे हुए हैं। ग़ालिब शिकायत भी कर रहे हैं कि तुमने तमाशा कर दिया लेकिन मुझसे आके गिला नहीं किया।  अगर कोई शिकायत थी तो हम बात कर सकते थे ताकि ऐसी नौबत ही नहीं आती।  
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
– मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ालिब अपनी माशूका से कहते हैं कि ये मत पूछ तेरे बग़ैर मेरा हाल कैसा होता है। अगर तुझे ये जानना है तो मेरा हाल ठीक वैसा ही होता है जब तू मेरे सामने होती है और मुझे देखकर थोड़ा शर्माती है और परेशान होती है। इस शेर में ग़ालिब ने थोड़ा वार्ड प्ले किया है और बहुत ही ख़ूबसूरती से अपना और अपनी माशूका का हाल बयाँ किया है।
उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
– मिर्ज़ा ग़ालिब
ये बहुत ही कमाल का शे'र है। इस शेर में ग़ालिब एक ऐसी ग़लत-फ़हमी को बयाँ कर रहे हैं जो उनकी माशूका को हो जाती है। ग़ालिब कहते हैं कि जब उनकी महबूबा उन्हें देखने या मिलने के लिए आती है तो इस चीज़ से ग़ालिब के चेहरे पर अपने आप ही रौनक़ आ जाती है जिसकी कोई मिसाल ही नहीं। मगर ये सब  देख कर उनकी माशूका को लगता है कि उनका माशूक बिल्कुल सही सलामत है। यहाँ ग़ालिब अपनी माशूका के प्रति अपना प्यार दर्शा रहे हैं और ये भी बता रहे हैं कि उनकी माशूका भी उनके लिए किसी दवा की तरह है।
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने
– मिर्ज़ा ग़ालिब
इस शेर में ग़ालिब कहते हैं कि इश्क़ पर किसी का बस नहीं होता। अगर ये किसी से हो जाए तो ख़त्म नहीं होती और अगर इश्क़ न हो तो चाहे कितनी भी ज़बरदस्ती कर लें इश्क़ नहीं होता। उन्होंने इश्क़ के होने न होने को आतिश यानी आग से जोड़ा है और कहा है कि इश्क़ वो आग है जिसे न तो लगाया जा सकता है और न ही बुझाया जा सकता है। इस तरह ग़ालिब इश्क़ को इंसान के नियंत्रण से बाहर की चीज़ बताते हैं।
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है
– मिर्ज़ा ग़ालिब
ये शेर इंसान की हताशा और कुछ न कर पाने की स्थिति को दर्शाता है। जिस्म का अर्थ बाहरी दुनिया की चीज़ों से है और दिल का अर्थ अंदर की भावनाओं से है। ग़ालिब कहते हैं कि जब इंसान अंदरूनी और बाहरी रूप से टूट जाता है तो फिर उसके ज़ख़्मों को कुरेदने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। इस स्थिति में आदमी बे-हिस हो जाता है और प्यार, सुकून या रिश्ते से बहुत दूर हो जाता है और हमेशा तक़लीफ़ में रहता है। 
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
– मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ालिब कह रहे हैं कि वो उसे ख़ून नहीं मानते जो सिर्फ़ रगों में दौड़ता है बल्कि वो ये कहते हैं कि अगर इंसान अपना दुख-दर्द आँखों से आँसुओं के रूप में न व्यक्त कर पाए तो फिर ऐसा लहू किसी भी काम का नहीं। यहाँ 'आँख से टपकना' भावनाओं के प्रकट होने का प्रतीक है। शेर का भाव यह है कि असली इंसानियत और जीवंतता तभी है जब दिल के एहसास बाहर झलकें।  

दोस्तो, उम्मीद करते हैं कि आपको हमारी ये कोशिश पसंद आयी होगी। मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी जब समझ में आने लगे तब मालूम होता है कि वो कितने बड़े शायर हैं। इसलिए हमने ग़ालिब की शायरी explanation के साथ आप तक पहुँचाने का प्रयास किया है। अपना पसंदीदा शे'र कॉमेंट करके ज़रूर बताएँ।

शुक्रिया।