Allama Iqbal Shayari in Hindi with Explanation

दोस्तो, मीर तक़ी मीर और मिर्ज़ा ग़ालिब के बाद आए महाम शायरों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है। अलग-अलग दौर में कई ऐसे शायर आए जिन्होंने अपने सुख़न से लोगों के दिल जीते। इन शायरों में एक नाम अल्लामा इक़बाल साहब का भी है। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि अल्लामा साहब एक दार्शनिक शायर थे। इनके कई अश'आर तो बच्चे-बच्चे की ज़बान पर हैं। कुछ शायर ऐसे होते हैं जिन्हें कोई भी दौर भुला नहीं सकता और इक़बाल साहब ऐसे ही शायर हैं। 

Shayari explanation सीरीज़ में आज हम अल्लामा इक़बाल की शायरी डीकोड करेंगे और उनके कुछ बेहतरीन अश'आर उनके मा'नी के साथ समझेंगे। तो चलिए अब आगे बढ़ते हैं और पहले शे'र पर आते हैं।

अल्लामा इक़बाल के चंद अश'आर

अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी
तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन
– अल्लामा इक़बाल
यह शे'र इंट्रोस्पेक्शन के विषय को दर्शाता है। इक़बाल कहते हैं कि ज़िंदगी का असली मतलब और उसका रास्ता बाहर नहीं, बल्कि हमारे अपने अंदर छिपा होता है। इंसान ज़िंदगी की भाग-दौड़ में इतना मसरूफ़ है कि वो अपने ही अस्तित्व की समझ नहीं रखता। न केवल मसरूफ़ है, वो ख़ुद को दूसरों के जैसा बनाने पे तुला रहता है और अपनी मौजूदगी को नज़र-अंदाज़ करता है। इक़बाल साहब एक संदेश दे रहे हैं कि इंसान को ऐसा बनने से बचना चाहिए और ख़ुद की तलाश ता-उम्र तक करनी चाहिए।
दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
– अल्लामा इक़बाल
यह शे'र हताशा और बेबसी के मौज़ूअ पर कहा गया है। अल्लामा इक़बाल की शायरी में आप ऐसे भी शे'र पाएँगे जो इंसान की निराशा दर्शाते हैं। इक़बाल कहते हैं कि किसी भी महफ़िल का मज़ा वही आदमी ले सकता है जो अंदर से ख़ुश और संतुष्ट हो। ऐसा आदमी जिसका दिल बुझ गया हो, यानी जो ज़िंदगी के मरहलों से उकता गया हो वो दुनिया की रौनक़ से बहुत दूर हो जाता है। यह शे'र मुमकिन है कि आदमी के मुसलसल कोशिशों के बाद मिली नाकामयाबी के ज़ाविए को भी छूता है।
फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का
न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है
– अल्लामा इक़बाल
यह शे'र आकर्षण के पहले मरहले पे कहा गया है। शे'र कहता है कि किसी आदमी को हम पसंद तभी कर लेते हैं जब उसकी पहली झलक देखते हैं। दिल का यह फ़ैसला कि सामने वाला आदमी ख़ूबसूरत है या नहीं, ये नटखटी आँखें ही तय करती हैं। यह देखा जाए तो युवा अवस्था के इश्क़ की दास्ताँ को बयाँ करता है। कम-उम्र में अक्सर इश्क़ चेहरे की चमक-दमक की वज्ह से हो जाता है और ऐसे मौक़े पर दिमाग़ से काम लेना बहुत मुश्किल होता है।
उक़ाबी रूह जब बेदार होती है जवानों में
नज़र आती है उन को अपनी मंज़िल आसमानों में
– अल्लामा इक़बाल
यह शे'र जोश और प्रेरणा को दर्शाता है। जब युवाओं में सफ़लता की भूक जागती है तो वो सभी हदों को पार कर जाते हैं अपनी मंज़िल हासिल करने के लिए। चाहे कोई पढ़ाई-लिखाई करके बड़े ओहदे पे पहुँचना चाहता हो या फिर किसी अन्य राह पर चल रहा हो, हौसला करके अगर चला जाए तो परिणाम हमेशा बेहतर ही होता है।
अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल
लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे
– अल्लामा इक़बाल
इस शेर में इक़बाल कहते हैं कि इंसान के दिल के साथ अक़्ल (समझ-बूझ) किसी अच्छे मुक़ाम तक पहुँचने के लिए ज़रूरी है। यानी इंसान अपने जज़्बात के साथ-साथ सोच-समझकर भी फ़ैसले ले। अक़्ल दिल को ग़लत रास्तों पर जाने से रोकती है। लेकिन दूसरी पंक्ति में वे एक अहम बात कहते हैं कि कभी-कभी दिल को अकेला भी छोड़ देना चाहिए, यानी हर वक़्त ज़ियादा सोच-विचार या तर्क में उलझे रहने की बजाय इंसान को अपने जज़्बात और एहसासात को भी खुलकर जीने देना चाहिए।
बुतों से तुझ को उमीदें ख़ुदा से नौमीदी
मुझे बता तो सही और काफ़िरी क्या है
– अल्लामा इक़बाल
इस शे'र में इक़बाल इंसान की सोच पर सवाल उठा रहे हैं। वे कहते हैं कि आदमी दुनिया की चीज़ों, लोगों, धन-दौलत या दूसरे सहारों से तो बड़ी-बड़ी उम्मीदें रखता है, लेकिन ख़ुदा की रहमत और उसकी ताक़त पर भरोसा नहीं करता, तो इससे बड़ी काफ़िरी ( ईश्वर से इनकार या आस्था का अभाव) क्या हो सकती है। शे'र का मूल संदेश यह है कि सच्ची आस्था केवल ख़ुदा को मानने में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी उससे उम्मीद बनाए रखने में है। दुनिया के अस्थायी सहारों पर अधिक भरोसा और ख़ुदा से निराश होना आस्था की कमी को दर्शाता है।
तमन्ना दर्द-ए-दिल की हो तो कर ख़िदमत फ़क़ीरों की
नहीं मिलता ये गौहर बादशाहों के ख़ज़ीनों में
– अल्लामा इक़बाल
इस शे'र में इक़बाल कहते हैं कि यदि किसी इंसान को दिल की सच्ची संवेदना, प्रेम, करुणा और इंसानियत का दर्द महसूस करना है, तो उसे फ़क़ीरों, ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की सेवा करनी चाहिए। दिल की यह अनमोल दौलत (गौहर) धन, सत्ता और शाही ख़ज़ानों से प्राप्त नहीं होती, बल्कि दूसरों के दुख को समझने और उनकी मदद करने से मिलती है। शायर का संदेश है कि इंसान का चरित्र और आध्यात्मिक ऊँचाई सेवा, विनम्रता और मानवता से बनती है, न कि केवल धन-संपत्ति या पद से।
इल्म में भी सुरूर है लेकिन
ये वो जन्नत है जिस में हूर नहीं
– अल्लामा इक़बाल
जब भी अल्लामा इक़बाल की शायरी की बातें होती हैं तो इस शे'र का ज़िक्र करना बेहद ज़रूरी है। इक़बाल कहते हैं कि ज्ञान (इल्म) प्राप्त करने में भी एक अलग तरह का सुख, आनंद और नशा (सुरूर) होता है, लेकिन यह आनंद उस जन्नत की तरह है जिसमें भौतिक सुख-सुविधाएँ या आकर्षक पुरस्कार (हूर) नहीं होते। अर्थात् ज्ञान का सुख बाहरी नहीं, बल्कि बौद्धिक और आत्मिक होता है। शायर यह बताना चाहते हैं कि इल्म अपने आप में एक बड़ी ने'मत है, पर उसका आनंद समझ, चिंतन और आत्म-विकास से मिलता है, न कि सांसारिक या शारीरिक सुखों से।
बातिल से दबने वाले ऐ आसमाँ नहीं हम
सौ बार कर चुका है तू इम्तिहाँ हमारा
– अल्लामा इक़बाल
इस शे'र में शायर हिम्मत, आत्मसम्मान और संघर्ष की भावना को व्यक्त कर रहे हैं। शायर कहते हैं कि हम झूठ, अत्याचार और अन्याय के सामने झुकने वाले नहीं हैं। ऐ आसमान! तूने हमें बार-बार कठिनाइयों, परीक्षाओं और मुसीबतों में डाला है, लेकिन हर बार हम उनसे निकलकर और मज़बूत होकर उभरे हैं। 'आसमाँ' यहाँ मिश्किलात का प्रतीक है जो हर इंसान के जीवन में आता ही है। यह शेर विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रहने, हार न मानने और अपने सिद्धांतों पर डटे रहने का संदेश देता है।
ढूँडता फिरता हूँ मैं 'इक़बाल' अपने आप को
आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं
– अल्लामा इक़बाल
इस शे'र में अल्लामा इक़बाल self-discovery की गहरी बात करते हैं। वे कहते हैं कि मैं अपने वास्तविक स्वरूप और पहचान को खोजता फिर रहा हूँ, लेकिन धीरे-धीरे यह एहसास होता है कि जिसे मैं बाहर तलाश रहा हूँ, वह मेरे भीतर ही मौजूद है। इसलिए मैं स्वयं ही इस यात्रा का मुसाफ़िर भी हूँ और उसकी मंज़िल भी। शे'र का संदेश यह है कि इंसान की सबसे बड़ी खोज अपने ही व्यक्तित्व, क्षमता और आत्मा को पहचानना है, और इस खोज का उत्तर किसी बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि उसके अपने भीतर ही छिपा होता है।
आँख जो कुछ देखती है लब पे आ सकता नहीं
महव-ए-हैरत हूँ कि दुनिया क्या से क्या हो जाएगी
– अल्लामा इक़बाल
शायर कहते हैं कि मेरी आँखें जो कुछ देख रही हैं, जो भविष्य के संकेत, परिवर्तन और संभावनाएँ मुझे दिखाई दे रही हैं, उन्हें शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है। मैं उन दृश्यों और संभावनाओं को देखकर इतना आश्चर्यचकित हूँ कि बस हैरान होकर सोच रहा हूँ कि यह दुनिया आगे चलकर क्या से क्या बन जाएगी। यहाँ 'आँख' केवल देखने वाली आँख नहीं है, बल्कि एक दूरदर्शी नज़र, चिंतन और अंतर्दृष्टि (insight) का प्रतीक है। इस शे'र का एक गहरा अर्थ यह भी है कि कुछ सत्य और अनुभूतियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें केवल महसूस किया जा सकता है, पूरी तरह शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता। महान विचारक और कवि अक्सर अपने समय से आगे की चीज़ें देख लेते हैं, लेकिन उनके पास उन्हें समझाने के लिए पर्याप्त शब्द नहीं होते। इसलिए वे आश्चर्य और प्रतीक्षा में रहते हैं।

दोस्तो, ये थे अल्लामा इक़बाल के चंद मशहूर अश'आर मा'नी के साथ। यूँ तो अल्लामा इक़बाल की शायरी में ऐसे बहुत से अश'आर हैं जो ज़िंदगी के अलग-अलग पहलूओं को दर्शाते हैं लेकिन इस पोस्ट के लिए मैंने इतने ही शेरों को लिया है। उम्मीद करता हूँ कि आपको ये पोस्ट पसंद आई होगी। इक़बाल साहब का कौन सा शे'र आपका पसंदीदा है कॉमेंट करके ज़रूर बताएँ। मिलते हैं अगली पोस्ट में।