Shakeel Azmi
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Ghazal
परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है
परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है
ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है
मिला है हुस्न तो इस हुस्न की हिफ़ाज़त कर
सँभल के चल तुझे सारा जहान देखता है
कनीज़ हो कोई या कोई शाहज़ादी हो
जो इश्क़ करता है कब ख़ानदान देखता है
घटाएँ उठती हैं बरसात होने लगती है
जब आँख भर के फ़लक को किसान देखता है
यही वो शहर जो मेरे लबों से बोलता था
यही वो शहर जो मेरी ज़बान देखता है
मैं जब मकान के बाहर क़दम निकालता हूँ
अजब निगाह से मुझ को मकान देखता है
- शकील आज़मी
मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल
मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल
तू भी हो जाएगा बदनाम मिरे साथ न चल
तू नई सुबह के सूरज की है उजली सी किरन
मैं हूँ इक धूल भरी शाम मिरे साथ न चल
अपनी ख़ुशियाँ मिरे आलाम से मंसूब न कर
मुझ से मत माँग मिरा नाम मिरे साथ न चल
तू भी खो जाएगी टपके हुए आँसू की तरह
देख ऐ गर्दिश-ए-अय्याम मिरे साथ न चल
मेरी दीवार को तू कितना सँभालेगा 'शकील'
टूटता रहता हूँ हर गाम मिरे साथ न चल
- शकील आज़मी
ख़ुद को इतना भी मत बचाया कर
ख़ुद को इतना भी मत बचाया कर
बारिशें हों तो भीग जाया कर
काम ले कुछ हसीन होंठों से
बातों बातों में मुस्कुराया कर
दर्द हीरा है दर्द मोती है
दर्द आँखों से मत बहाया कर
चाँद ला कर कोई नहीं देगा
अपने चेहरे से जगमगाया कर
धूप मायूस लौट जाती है
छत पे कपड़े सुखाने आया कर
घर से बाहर निकल हवाओं में
ज़ुल्फ़ से ख़ुशबुएँ उड़ाया कर
कोई तस्वीर कोई अफ़साना
कुछ न कुछ रोज़ ही बनाया कर
कौन कहता है दिल मिलाने को
कम से कम हाथ तो मिलाया कर
- शकील आज़मी
दर्द की हद से गुज़ारे तो सभी जाएँगे
दर्द की हद से गुज़ारे तो सभी जाएँगे
जल्द या देर से मारे तो सभी जाएँगे
सिर्फ़ मैं ही नहीं बाज़ार की मंदी का शिकार
जेब में ले के ख़सारे तो सभी जाएँगे
नद्दियाँ लाशों को पानी में नहीं रखती हैं
तैरें या डूबें किनारे तो सभी जाएँगे
चाहे कितनी भी बुलंदी पे चला जाए कोई
आसमानों से उतारे तो सभी जाएँगे
मस्जिदें सब को बुलाती हैं भलाई की तरफ़
आएँ न आएँ पुकारे तो सभी जाएँगे
- शकील आज़मी
कुछ इस तरह से मिलें हम कि बात रह जाए
कुछ इस तरह से मिलें हम कि बात रह जाए
बिछड़ भी जाएँ तो हाथों में हात रह जाए
अब इस के बा'द का मौसम है सर्दियों वाला
तिरे बदन का कोई लम्स साथ रह जाए
मैं सो रहा हूँ तिरे ख़्वाब देखने के लिए
ये आरज़ू है कि आँखों में रात रह जाए
मैं डूब जाऊँ समुंदर की तेज़ लहरों में
किनारे रक्खी हुई काएनात रह जाए
'शकील' मुझ को समेटे कोई ज़माने तक
बिखर के चारों तरफ़ मेरी ज़ात रह जाए
- शकील आज़मी
फूल का शाख़ पे आना भी बुरा लगता है
फूल का शाख़ पे आना भी बुरा लगता है
तू नहीं है तो ज़माना भी बुरा लगता है
ऊब जाता हूँ ख़मोशी से भी कुछ देर के बाद
देर तक शोर मचाना भी बुरा लगता है
इतना खोया हुआ रहता हूँ ख़यालों में तिरे
पास मेरे तिरा आना भी बुरा लगता है
ज़ाइक़ा जिस्म का आँखों में सिमट आया है
अब तुझे हाथ लगाना भी बुरा लगता है
मैं ने रोते हुए देखा है अली बाबा को
बाज़ औक़ात ख़ज़ाना भी बुरा लगता है
अब बिछड़ जा कि बहुत देर से हम साथ में हैं
पेट भर जाए तो खाना भी बुरा लगता है
- शकील आज़मी
बहुत कुछ जान के जाना है तुम को
बहुत कुछ जान के जाना है तुम को
बड़ी मुश्किल से पहचाना है तुम को
मुझे जो तुम समझते हो ग़लत है
किसी दिन ये भी समझाना है तुम को
मैं अपने ख़ौफ़ की हद पर खड़ा हूँ
अब इस के बा'द घबराना है तुम को
ख़ुदा ख़ुद को समझते हो तो समझो
मगर इक रोज़ मर जाना है तुम को
चले जाओ मगर घर मत गिराओ
इसी चौखट पे फिर आना है तुम को
ये जंगल है यहाँ घर हैं न गमले
यहीं पे खुल के मुरझाना है तुम को
ज़रा सा देखना है आइने में
फिर इस के बा'द शर्माना है तुम को
- शकील आज़मी
जान दे सकता है क्या साथ निभाने के लिए
जान दे सकता है क्या साथ निभाने के लिए
हौसला है तो बढ़ा हाथ मिलाने के लिए
हँस रहा हूँ मैं बहुत मुझ को रुलाने के लिए
आ हवा मेरे चराग़ों को बुझाने के लिए
शम' गुल कर के हवा देख रही है मुझ को
आख़िरी तीली है माचिस में जलाने के लिए
ज़ख़्म-ए-दिल इस लिए चेहरे पे सजा रक्खा है
कुछ तमाशा तो हो दुनिया को दिखाने के लिए
इक झलक देख लें तुझ को तो चले जाएँगे
कौन आया है यहाँ 'उम्र बिताने के लिए
मैं ने दीवार पे क्या लिख दिया ख़ुद को इक दिन
बारिशें होने लगीं मुझ को मिटाने के लिए
फ़िल्म के पर्दे पे छपना कोई आसान नहीं
मरना पड़ता है यहाँ नाम कमाने के लिए
- शकील आज़मी
अपनी हस्ती को मिटा दूँ तिरे जैसा हो जाऊँ
अपनी हस्ती को मिटा दूँ तिरे जैसा हो जाऊँ
इस तरह चाहूँ तुझे मैं तिरा हिस्सा हो जाऊँ
पायलें बाँध के बारिश की करूँ रक़्स-ए-जुनूँ
तू घटा बन के बरस और मैं सहरा हो जाऊँ
दूर तक ठहरा हुआ झील का पानी हूँ मैं
तेरी परछाईं जो पड़ जाए तो दरिया हो जाऊँ
शहर-दर-शहर मिरे इश्क़ की नौबत बाजे
मैं जहाँ जाऊँ तिरे नाम से रुस्वा हो जाऊँ
आदमी बन के बहुत मैं ने तुझे सज्दे किए
तो ख़ुदा बन के मुझे मिल मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ
इस तरह मिल कि बिछड़ने का तसव्वुर न रहे
इस तरह माँग मुझे तू कि मैं तेरा हो जाऊँ
इतना बीमार कि साँसों से धुआँ उठता है
आ तुझे देख लूँ और देख के अच्छा हो जाऊँ
- शकील आज़मी
बात से बात की गहराई चली जाती है
बात से बात की गहराई चली जाती है
झूट आ जाए तो सच्चाई चली जाती है
रात भर जागते रहने का अमल ठीक नहीं
चाँद के इश्क़ में बीनाई चली जाती है
मैं ने इस शहर को देखा भी नहीं जी भर के
और तबीअत है कि घबराई चली जाती है
कुछ दिनों के लिए मंज़र से अगर हट जाओ
ज़िंदगी भर की शनासाई चली जाती है
प्यार के गीत हवाओं में सुने जाते हैं
दफ़ बजाती हुई रुस्वाई चली जाती है
छप से गिरती है कोई चीज़ रुके पानी में
दूर तक फटती हुई काई चली जाती है
मस्त करती है मुझे अपने लहू की ख़ुश्बू
ज़ख़्म सब खोल के पुरवाई चली जाती है
दर ओ दीवार पे चेहरे से उभर आते हैं
जिस्म बनती हुई तन्हाई चली जाती है
- शकील आज़मी
कहानी जिस की थी उस के ही जैसा हो गया था मैं
कहानी जिस की थी उस के ही जैसा हो गया था मैं
तमाशा करते करते ख़ुद तमाशा हो गया था मैं
न मेरा नाम था न दाम बाज़ार-ए-मोहब्बत में
बस उस ने भाव पूछा और महँगा हो गया था मैं
कई दिन तक उसे देखा नहीं जब उस की खिड़की पर
तो अपनी आँखों में खिड़की का पर्दा हो गया था मैं
बिछड़ कर उस से तन्हाई का वो 'आलम रहा मुझ में
कि इक दिन आइने में उस का चेहरा हो गया था मैं
बुझा तो ख़ुद में इक चिंगारी भी बाक़ी नहीं रक्खी
उसे तारा बनाने में अंधेरा हो गया था मैं
बिता दी 'उम्र मैं ने उस की इक आवाज़ सुनने में
उसे जब बोलना आया तो बहरा हो गया था मैं
बहुत दिन बा'द वो इक दिन बिछड़ कर फिर मिला मुझ को
मगर इस बार मिलते ही अकेला हो गया था मैं
वो दुश्मन दोस्त बन कर घात में था अच्छे मौक़े की
पता उस दिन चला जिस दिन निहत्ता हो गया था मैं
सो ख़ुद को ढूँड कर इक रोज़ गोली मार दी मैं ने
जिसे चाहा उसी की जाँ का ख़तरा हो गया था मैं
- शकील आज़मी
चाँद में ढलने सितारों में निकलने के लिए
चाँद में ढलने सितारों में निकलने के लिए
मैं तो सूरज हूँ बुझूँगा भी तो जलने के लिए
मंज़िलो तुम ही कुछ आगे की तरफ़ बढ़ जाओ
रास्ता कम है मिरे पाँव को चलने के लिए
ज़िंदगी अपने सवारों को गिराती जब है
एक मौक़ा भी नहीं देती सँभलने के लिए
मैं वो मौसम जो अभी ठीक से छाया भी नहीं
साज़िशें होने लगीं मुझ को बदलने के लिए
वो तिरी याद के शोले हों कि एहसास मिरे
कुछ न कुछ आग ज़रूरी है पिघलने के लिए
ये बहाना तिरे दीदार की ख़्वाहिश का है
हम जो आते हैं इधर रोज़ टहलने के लिए
आँख बेचैन तिरी एक झलक की ख़ातिर
दिल हुआ जाता है बेताब मचलने के लिए
- शकील आज़मी
धुआँ धुआँ है फ़ज़ा रौशनी बहुत कम है
धुआँ धुआँ है फ़ज़ा रौशनी बहुत कम है
सभी से प्यार करो ज़िंदगी बहुत कम है
मक़ाम जिस का फ़रिश्तों से भी ज़ियादा था
हमारी ज़ात में वो आदमी बहुत कम है
हमारे गाँव में पत्थर भी रोया करते थे
यहाँ तो फूल में भी ताज़गी बहुत कम है
जहाँ है प्यास वहाँ सब गिलास ख़ाली हैं
जहाँ नदी है वहाँ तिश्नगी बहुत कम है
ये मौसमों का नगर है यहाँ के लोगों में
हवस ज़ियादा है और आशिक़ी बहुत कम है
तुम आसमान पे जाना तो चाँद से कहना
जहाँ पे हम हैं वहाँ चाँदनी बहुत कम है
बरत रहा हूँ मैं लफ़्ज़ों को इख़्तिसार के साथ
ज़ियादा लिखना है और डाइरी बहुत कम है
- शकील आज़मी
तुझ को सोचों तो तिरे जिस्म की ख़ुशबू आए
तुझ को सोचों तो तिरे जिस्म की ख़ुशबू आए
मेरी ग़ज़लों में अलामत की तरह तू आए
मैं तुझे छेड़ के ख़ामोश रहूँ सब बोलें
बातों बातों में कोई ऐसा भी पहलू आए
क़र्ज़ है मुझ पे बहुत रात की तन्हाई का
मेरे कमरे में कोई चाँद न जुगनू आए
लग के सोई है कोई रात मिरे सीने से
सुबह हो जाए कि जज़्बात पे क़ाबू आए
चाहता हूँ कि मिरी प्यास का मातम यूँ हो
फिर न इस दश्त में मुझ सा कोई आहू आए
उस का पैकर कई क़िस्तों में छपे नॉवेल सा
कभी चेहरा कभी आँखें कभी गेसू आए
फिर मुझे वज़्न किया जाए शहादत के लिए
फिर अदालत में कोई ले के तराज़ू आए
अब के मौसम में ये दीवार भी गिर जाए 'शकील'
इस तरह जिस्म की बुनियाद में आँसू आए
- शकील आज़मी
तू नहीं दिल में मगर तेरा निशाँ बाक़ी है
तू नहीं दिल में मगर तेरा निशाँ बाक़ी है
बुझ गई आग मोहब्बत की धुआँ बाक़ी है
मैं अगर तुझ में नहीं हूँ तो कोई बात नहीं
तू भी अब मुझ में मिरी जान कहाँ बाक़ी है
मैं तिरे बेवफ़ा होने से परेशान नहीं
दिल लगाने को अभी सारा जहाँ बाक़ी है
जिस जगह हम ने कैलन्डर में जुदाई लिखी
इक मुलाक़ात की तारीख़ वहाँ बाक़ी है
मेरा विश्वास मोहब्बत से नहीं उठ सकता
जब तलक शहर में फूलों की दुकाँ बाक़ी है
- शकील आज़मी
Nazm
माँ के इंतिक़ाल पर
अल्लाह-जी
हम सो नहीं पाते
अम्मी को कब भेजोगे
नानी कहती हैं
तुम हम से रूठे हो
लेकिन अब हम
रोज़ाना मकतब जाएँगे
तुम को तख़्ती पर लिक्खेंगे
असलम मिस्टर गंदे हैं
उन के साथ नहीं खेलेंगे
अल्लाह-जी
अब मान भी जाओ
चाहो तो
अम्मी के बदले
हम से सारी चीज़ें ले लो
गेंद भी ले लो
और गोली भी
लट्टू ओर ग़ुलैल भी ले लो
लेकिन हम को अम्मी दे दो
हम को हमारी अम्मी दे दो
- शकील आज़मी
झूटी मोहब्बत
तुम्हारा मैं हूँ मिरे तुम हो अच्छे जुमले हैं
मगर ये बात बहुत दूर है सदाक़त से
कहीं से तुम हो अधूरे कहीं से ख़ाली मैं
तुम अपने तौर मुझे इस्तिमाल करते हो
मैं अपने तौर तुम्हें इस्तिमाल करता हूँ
ये ज़िंदगी है यहाँ घात में है हर कोई
सब अपनी अपनी ज़रूरत में छुप के बैठे हैं
कहीं नहीं है मोहब्बत फ़रेब है सब कुछ
मगर ये झूटी मोहब्बत बहुत ज़रूरी है
हवा में जैसे हरारत बहुत ज़रूरी है
- शकील आज़मी
कच्चे रंगों का मौसम
घर से बस्ता और टिफ़िन के साथ निकलना मकतब को
आधे ही रस्ते से घूम के वापस आना
शाम ढले तक
खेलना कूदना
झगड़े करना
फिर मिल जाना
बाग़ से जा कर आम चुराना
पकड़े जाना
घर पर आ कर डाँटें सुनना
कभी कभी थप्पड़ भी खाना
गन्ने के मुरझाए और काले फूलों से
नक़ली दाढ़ी मूंछ बनाना
छुप कर जूठी बीड़ी पीना
खेतों में झाड़े को जाना
इधर उधर की बातें करना
इक गोरे लड़के के पीछे तकते रहना
कम-उम्री में बालिग़ होना
उल्टे सीधे ध्यान में शब भर
जागते रहना
कितना अच्छा लगता था
वो रातें कितनी प्यारी थीं
वो दिन कितने अलबेले थे
- शकील आज़मी
मेरा बाप
खुली फ़ज़ा में साफ़ हवा के जैसा वो
बारिश के पानी के जैसा वो
गहरा था मिट्टी से रिश्ता पैरों का
उस रिश्ते के बीच न आई चप्पल भी
घड़ी न बाँधी कभी कलाई पर उस ने
सूरज-तारे वक़्त उसे बतलाते थे
अपने बल पर अपनी धुन में रहता था
नहीं किसी से गाँव में वो डरता था
नाम की ख़्वाहिश थी न उसे पहचान की थी
बस अपने कामों से मतलब रखता था
वो दाना था वो मिट्टी था
वो पौदा था वो मौसम था
वो सच्चा ख़ालिस इंसान था
जैसे आदम और हव्वा थे
वो तन्हा था
एक बड़े से घर में तन्हा रहता था
भैंसें उस के साथ थीं
उस की बात समझती थीं
वो भी उन की ही भाषा में उन से बातें करता था
घर पर अक्सर लगा के ताला यूँही सा
खलियानों में रहने वाला बाप मिरा
खेतों खेतों बसने वाला बाप मिरा
आम की छाँव में सोने वाला बाप मिरा
अब मिट्टी में सोता है
आम के पेड़ की ख़ुश्क जड़ों में रोता है
- शकील आज़मी
चाहत की पहली बारिश
वो जीने की पहली ख़्वाहिश
वो चाहत की पहली बारिश
जिस में हम दोनों भीगे थे
आँखों से दिल तक गीले थे
रोने में मज़ा आता था बहुत
खोने में मज़ा आता था बहुत
क़िस्से लम्बे थे रातों से
जी भरता कब था बातों से
मौसम पे जवानी होती थी
हर शाम सुहानी होती थी
हम थाम के बाँहें बाँहों में
निकले थे वफ़ा की राहों में
इक मोड़ पे दोनों बिछड़े थे
अरमान भरे दिल उजड़े थे
दिल लेकिन याद तो करता है
रो कर फ़रियाद तो करता है
ऐ मीत पुराने आ जाओ
वो दिन दुहराने आ जाओ
- शकील आज़मी
मैं सीता हूँ
पती के साथ में
बनवास में रहना मुक़द्दर है मिरा
कोई रावन मिरी कुटिया में भक्षक बन के आए
धोका दे मुझ को
उठा ले जाए मुझ को मेरी दुनिया से
बिछड़ जाऊँ मैं अपनों से
बचा कर दुश्मनों से धर्म भी
मर्यादा भी
ज़िंदा रखूँ ख़ुद को
पराए देस में अपने पती का रास्ता देखूँ
कटे हर पल मिरा सदियों के जैसा
मिरे दुख को समझने की किसी को क्या ज़रूरत है
भले मैं राम की पत्नी हूँ लेकिन हूँ तो औरत ही
ये जो सम्मान है इस से मुझे नीचे उतारो
मुझे अग्नी परिक्षा से गुज़ारो
- शकील आज़मी
Sher
हार हो जाती है जब मान लिया जाता है
हार हो जाती है जब मान लिया जाता है
जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है
- शकील आज़मी
अपनी मंज़िल पे पहुँचना भी खड़े रहना भी
अपनी मंज़िल पे पहुँचना भी खड़े रहना भी
कितना मुश्किल है बड़े हो के बड़े रहना भी
- शकील आज़मी
मैं सो रहा हूँ तिरे ख़्वाब देखने के लिए
मैं सो रहा हूँ तिरे ख़्वाब देखने के लिए
ये आरज़ू है कि आँखों में रात रह जाए
- शकील आज़मी
भूक में इश्क़ की तहज़ीब भी मर जाती है
भूक में इश्क़ की तहज़ीब भी मर जाती है
चाँद आकाश पे थाली की तरह लगता है
- शकील आज़मी
इस बार उस की आँखों में इतने सवाल थे
इस बार उस की आँखों में इतने सवाल थे
मैं भी सवाल बन के सवालों में रह गया
- शकील आज़मी
तुम्हारी मौत ने मारा है जीते-जी हम को
तुम्हारी मौत ने मारा है जीते-जी हम को
हमारी जान भी गोया तुम्हारी जान में थी
- शकील आज़मी
बिछड़ के भी वो मिरे साथ ही रहा हर दम
बिछड़ के भी वो मिरे साथ ही रहा हर दम
सफ़र के बा'द भी मैं रेल में सवार रहा
- शकील आज़मी
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