जिस्म पर हर ज़ख़्म का रुतबा तो मरहम तय करेगा - ग़ज़ल

जिस्म पर हर ज़ख़्म का रुतबा तो मरहम तय करेगा
कितना हँसना है हमें ये बात भी ग़म तय करेगा

सिर्फ़ मेहनत हाथ में थी और अब क़िस्मत का है खेल

बीज हमने बो दिया बाक़ी तो मौसम तय करेगा


सिर्फ़ कहने को ही इंसाँ मानती है दुनिया वरना

ख़ाक भी था या नहीं ये वक़्त-ए-मातम तय करेगा


ठीक हूँ नज़दीक उसके या दुखी हूँ दूर होके

अब ये भी तफ़तीश करके मेरा हम-दम तय करेगा


तुम हो गंगा की तरह तो मेरी रग रग मानो यमुना

कब तलक ईश्वर न जाने अपना संगम तय करेगा