आँसुओं की नदी में गर जाना - ग़ज़ल


आँसुओं की नदी में गर जाना
रुकना मत सीधे पार कर जाना

गर मुकरना है तो मुकर जाना
बात लहजे की है, सुधर जाना

कुछ समझता नहीं था इश्क़ को मैं
जब हुआ मुझको तब असर जाना

जानते हो कि बोला क्या उसने!
‘मेरी आँखों को चूम कर जाना’

इतना ख़ुद्दार आदमी हूँ मैं 
मेरा मुश्किल ही है बिखर जाना

बस यही आम आदमी का है काम
आके दफ़्तर इधर-उधर जाना

कुछ गुलों तक ही था वो गुल महदूद
बाग़ से निकला तब शजर जाना