Meer Taqi Meer Shayari with Explanation

आदाब दोस्तो, आज हम जिस शायर की शायरी पढ़ने और समझने वाले हैं वो हैं मीर तक़ी मीर। मीर तक़ी मीर को ख़ुदा-ए-सुखन (शायरी का ख़ुदा) कहा जाता है। उर्दू शायरी को हिन्दुस्तान में प्रचलित कराने में मीर साहब का अहम योगदान रहा है। ये बात सच है कि ज़ियादा तर लोग ग़ालिब से ही वाक़िफ़ हैं और मीर से नहीं लेकिन मीर साहब का योगदान कभी भूला नहीं जा सकता। 

महबूब से शिकायत हो या ज़िंदगी का कोई फ़लसफ़ा, मीर तक़ी मीर की शायरी में सब एक अहम हिस्सा हैं। अक्सर ग़ालिब और मीर की तुलना की जाती है मगर मीर को समझने के लिए हमें तुलनात्मक रवैया अपनाने से बचना चाहिए। आइए आज हम मीर तक़ी मीर साहब के कुछ मक़बूल अश'आर उनके मा'नी के साथ समझने का प्रयास करते हैं।

Meer Taqi Meer Shayari with Explanation

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
– मीर तक़ी मीर
शायरी में महबूब के हुस्न की तारीफ़ बयान करना बहुत आम बात है। महबूब की आँखों, गाल, लब (होंठ) कुछ ऐसे आम विषय हैं जिनपे आपको तमाम अश'आर मिल जायेंगे। कुछ ऐसे ही अश'आर मीर तक़ी मीर की शायरी में भी मिलते हैं जिनमें से ये शे'र बहुत मक़बूल (famous) है। मीर साहब कहते हैं कि उनके महबूब के होंठ एक नाज़ुक (मुलायम) गुलाब की पंखुड़ी जैसे हैं, यानी उतने ही मुलायम, उतने ही ख़ूबसूरत और उतने ही तर। मीर ने अपनी शायरी में बहुत से उपमा का प्रयोग किया है जिससे उनकी शायरी में कमाल की ख़ूबसूरती झलकती है और ये शे'र उनमें से ही एक है। 
आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये
– मीर तक़ी मीर
यह शे'र मोहब्बत के सफ़र को दो अलग-अलग तरीक़े से बयान करता है। मीर साहब कहते हैं कि जब इश्क़ की शुरूआत हुई थी तो शायर बिलकुल आग की तरह थे, यानी जोश से भरे हुए थे बिलकुल आग की तरह। लेकिन ये आग वक़्त के साथ-साथ जलते हुए राख़ बन गई, यानी अपने अंत तक पहुँच गई। मीर कहते हैं इस मुक़ाम पर वो अंदर से टूट गए हैं और उनमें अब कुछ और नहीं बचा। यह शे'र दिल-ओ-जान से मोहब्बत निभाने वालों के नाम है और एक वास्तविक सच्चाई लिए हुए है कि इश्क़ का अंत होते-होते इंसान मानसिक रूप से टूट जाता है। 
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
– मीर तक़ी मीर
इस शे'र में 'बीमारी-ए-दिल' अस्ल में इश्क़ के रूपक के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। शायर कहते हैं कि इस दिल की बीमारी से बचने के लिए जो भी तरकीबें अपनाई गईं या जो भी इलाज किया गया वो सभी उलटी पड़ गईं, यानी किसी काम नहीं आ सकीं। इसका एक अर्थ यह भी है कि वक़्त और सब्र भी दिल के दर्द को कम नहीं कर पाए। इसकी वज्ह से शायर मानसिक और शारीरिक रूप से ख़त्म हो गया और सारी उम्मीदें भी साथ चली गईं । इसी को मीर साहब ने 'काम तमाम किया' कहके दर्शाया है। यह एक कमाल का दार्शनिक शे'र है और मीर तक़ी मीर की शायरी में आपको इस तरह के दार्शनिक अश'आर ख़ूब मिलेंगे। 
बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो
– मीर तक़ी मीर
इस शे'र में मीर साहब ने ज़िंदगी जीने का एक सीधा उसूल दिया है। वो कहते हैं कि इंसान चाहे दुखी होके जीवन व्यतीत कर रहा हो या ख़ुश होके इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। चाहे वो जैसे भी जी रहा हो लेकिन उसे मरते-मरते ऐसे काम या ऐसी पहचान बना लेनी है कि सारा ज़माना उसे याद रखे। यह शे'र इंसान को आग़ाज़ से नहीं बल्कि अंजाम से जानने के लिए प्रेरित करता है और अपने कर्मों को सुख-दुख से ऊपर देखने को कहता है। आदमी दुखी भले ही हो लेकिन दुख के साथ-साथ भी वो अपने लक्ष्य को हासिल करने की जुस्तुजू में हमेशा रहना चाहिए। यह एक प्रेरणादायक शे'र है और मीर साहब की शायरी में ऐसे अश'आर भी बहुत मिलते हैं। 
याद उस की इतनी ख़ूब नहीं 'मीर' बाज़ आ
नादान फिर वो जी से भुलाया न जाएगा
– मीर तक़ी मीर
मीर साहब, इस शे'र के ज़रिए खुद को नसीहत दे रहे हैं। वो अपने दिल को समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि किसी भी शख़्स की याद इतनी भी ख़ूबसूरत नहीं होती कि आदमी उसमें ही हर वक़्त डूबा रहे। वो ख़ुद को इस अवस्था से निकलने की नसीहत दे रहे हैं। लेकिन दूसरे मिसरे में एक स्वाभाविक बात भी पेश कर रहे हैं जहाँ वो कहते हैं कि इंसान का दिल बहुत नादान होता है। हमारा दिमाग़ भले ही किसी बात या शख़्स को भूलना चाहता हो लेकिन हमारा दिल भूल नहीं पाता और वो लोग जो दिल के क़रीब होते हैं उन्हें तो भूलना ना-मुम्किन सा लगता है चाहे हम कितनी भी ज़ोर-ज़बरदस्ती कर लें। 
इक़रार में कहाँ है इंकार की सी ख़ूबी
होता है शौक़ ग़ालिब उस की नहीं नहीं पर
– मीर तक़ी मीर
यह बेहद ही कमाल का और दिलकश शे'र है। मीर कहते हैं कि महबूब के इक़रार में वो ख़ूबी कहाँ जो उसके इंकार में है। यानी महबूब अगर हाँ कह दे तो इसमें आशिक़ के लिए उतना मज़े की बात नहीं जितना महबूब के 'ना' बोलने पर है। यहाँ मीर तक़ी मीर साहब कहते हैं कि महबूब की 'नहीं' दरअस्ल उसकी सख़्त मनाही नहीं, बल्कि नाज़, अदा और हुस्न का इज़हार है, जो आशिक़ के शौक़ को और बढ़ा देता है। वो कहते हैं कि इश्क़ में हर बार या हर मौक़े पर महबूब की हामी नहीं बल्कि रुकावट, संकोच और नाज़ से रिश्ता और गहरा और मज़बूत होता है। 
राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या
– मीर तक़ी मीर
यह शे'र तो आपने ज़रूर ही सुना होगा बल्कि इसका जो दूसरा मिसरा है वो अलग-अलग संदर्भ में कई बार आम बोल-चाल में भी इस्तेमाल किया जाता है। इस शेर में मीर कहते हैं कि इश्क़ का सफ़र बहुत तवील (लंबा) है और शुरूआती लम्हों की परेशानियाँ तो महज़ एक झलक है आने वाली मुसीबतों की। यहाँ मीर साहब आशिक़ को धैर्य रखने की नसीहत भी दे रहे हैं और आगे की चुनौतियों के लिए सावधान भी कर रहे हैं। इस शेर का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि भले ही अभी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा हो लेकिन एक बार अगर इस पड़ाव को पार कर लिया गया तो आगे का सफ़र आसान हो सकता है। तो इस शे'र में दोनों पहलू देखने को मिलते हैं।
कोई तुम सा भी काश तुम को मिले
मुद्दआ हम को इंतिक़ाम से है
– मीर तक़ी मीर
यह शे'र आशिक़ की तरफ़ से उसके महबूब से शिकवा करने के कार्य को उजागर करता है। आशिक़ को इसमें victim की तरह पेश किया गया है जो अपने महबूब से चोट खाया हुआ है। मीर अपने महबूब से कहते हैं कि काश तुम्हें भी कोई तुम्हारे जैसा ही मिले, तब तुम्हें समझ आएगा कि मेरे ऊपर क्या बीती है। यहाँ 'इंतिक़ाम' का अर्थ सीधा 'बदले' से नहीं है बल्कि उससे भी आगे के एहसास से है जो आशिक़ अपने महबूब को महसूस करवाना चाहता है।
बेवफ़ाई पे तेरी जी है फ़िदा
क़हर होता जो बा-वफ़ा होता
– मीर तक़ी मीर
यह शे'र आशिक़ के दर्दनाक एहसास को ज़ाहिर करता है। शायर अपने महबूब की बेवफ़ाई का ज़िक्र करते हैं और कहते हैं कि उनका दिल तो महबूब की बेवफ़ाई पर ही इतना फ़िदा है, न जाने तब उनका क्या हाल होगा अगर वो बा-वफ़ा होता। यानी अगर वो मीर के प्रेम को समझता तो कुछ ऐसा हो जाता जिसकी शायर कल्पना भी नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि उनको तो महबूब की बेवफ़ाई भी बहुत लुभा रही है। मीर तक़ी मीर की शायरी संग्रह में मैंने इस शे'र को इस पोस्ट में इसलिए भी जगह दी क्योंकि ये शे'र मुझे बहुत पसंद है। 

दोस्तो, आशा करता हूँ कि आपको ये पोस्ट पसंद आई होगी। मीर तक़ी मीर की शायरी में से मैंने कुछ मक़बूल अश'आर ही लिए हैं और उनके मा'नी समझाने की कोशिश की है। उम्मीद करता हूँ कि आपको मेरी कोशिश पसंद आई होगी। इस ब्लॉग पर आप अन्य शायरों की भी शायरी व्याख्या सहित पढ़ सकते हैं। आप मीर-बह्र पर मेरी ग़ज़ल तक़्तीअ के साथ भी पढ़ सकते हैं। मैंने दोनों के लिंक नीचे दिए हैं।  

शुक्रिया। 

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