मेरे लिए शायरी के ज़रिए दुख ज़ाहिर करना एक सौभाग्य की बात है। मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि कुछ अश'आर तो अस्ल में मेरे आँसू ही हैं। तो इस ब्लॉग पोस्ट में मैं अपनी कुछ बेहतरीन ग़ज़ल साझा कर रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ कि आपको पसंद आएँगी।
Best Ghazals Collection
आदमी आदमी पर भरोसा करे
एक रासिख़ से रिश्ते का पीछा करे
वक़्त जब भी कभी मुझको दूल्हा करे
बस यही चाहता हूँ तुम्हारा करे
वो मुझे छोड़ कर चल पड़ी इस तरह
जैसे इन आँखों को आँसू तन्हा करे
एक महताब लाऊँगा इन हाथों में
बस तू इक शाम आँखों में रक्खा करे
राज़ दिल के छिपाते हैं लब, हाँ मगर
कोई कब तक तबस्सुम से पर्दा करे
दुश्मनों से रफ़ाक़त की उम्मीद क्यूँ!
फूल का काम भी यानी काँटा करे
– अच्युतम यादव 'अबतर'
वो क्यूँ लोगों के दिल पत्थर बनाता है
ख़ुदा जब ख़ाक से पैकर बनाता है
मैं उसके आँसुओं में डूब जाता हूँ
बहाने सारे वो रो कर बनाता है
तिरा चेहरा कि मानो हो कोई मज़दूर
उतरते ही दिलों में घर बनाता है
क़फ़स का डर दिखाने के लिए नक़्क़ाश
क़फ़स चिड़िया के ही भीतर बनाता है
हर इक ठोकर का, हर इक मोड़ का है इल्म
मुझे ख़ुद रास्ता रहबर बनाता है
– अच्युतम यादव 'अबतर'
ख़ुद को बेबस दिखाने की कोशिश न की
सर-ब-सर इन नम आँखों से बारिश न की
मैं था अफ़सुर्दा, जीने की ख़्वाहिश न की
सदमें ने घेरा तो दिल ने जुंबिश न की
ज़ीस्त है कुछ ज़ियादा ही सफ़्फ़ाक़, पर
मौत की भी हर इक पल सताइश न की
रज़्म में अब कहीं पीछे रह जाता है
बाज ने अपने फ़न की नुमाइश न की
ख़्वाबों को नींद ने मेरी ढक रक्खा है
रात ने लेकिन इसकी सताइश न की
– अच्युतम यादव 'अबतर'
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आप आखें भले ही मल रहे हैं
हम तो अश्कों से अपने जल रहे हैं
पासबाँ हैं हम अपने साए के
उसके आगे ही कब से चल रहे हैं
पाँव मंज़िल पे क्या जमाए मियाँ
रिश्ते पत्थर से भी निकल रहे हैं
उनको राजा बनाएँ क्यों भला हम
जो हमारी जबीं कुचल रहे हैं
एक जुगनू की कर दी क्या तारीफ़
तारे इस झूठ को निगल रहे हैं
इक ग़ज़ल का शजर लगाना है
मेरे अशआर छत पे जल रहे हैं
– अच्युतम यादव 'अबतर'
ज़िन्दगी ले गई जिधर मुझ को
बस कराती रही सफ़र मुझ को
ऐ नज़र को उतारने वाले
लग गई आपकी नज़र मुझ को
हम तुम्हारे नसीब में नहीं हैं
चल दिए लोग बोलकर मुझ को
मैं कहानी में ख़ूब छाया रहा
पर किया सच ने मुख़्तसर मुझ को
मैंने तूफ़ानों को किया है पस्त
क्या डराएगा इक भँवर मुझ को
हमसफ़र की तलाश है जानाँ
तुझ को तो मिल गया है, पर मुझ को?
– अच्युतम यादव 'अबतर'
इक तफ़ावुत है उसके मिरे दरमियाँ
अपनी दानाई होती रही बे-निशाँ
हिज्र की रात काटें तो काटें कहाँ
गुम-शुदा है ज़मीं, है ख़फ़ा आसमाँ
बीच में टोकना उसकी आदत है यार
और अगर पूछूँ तो बोलती है 'कहाँ?'
छोड़ा है नक़्श-ए-पा अपना दिल में मिरे
कितना दिलकश है इन यादों का कारवाँ
सिर्फ़ ख़ामोशी ही है पड़ोसन मिरी
क़ब्र ही बन गया है अब अपना मकाँ
– अच्युतम यादव 'अबतर'
ज़र्द पत्ता ये कह रहा होगा
इक न इक दिन वो फिर हरा होगा
जो है ये फ़िक्र आगे क्या होगा
ज़ीस्त का ये भी फ़लसफ़ा होगा
मश्क़ करके कमाया था जो दिल
इक ही पल में वो आपका होगा
ज़िंदगी में अकेले हैं जो भी
कौन उनसे भला ख़फ़ा होगा
साँसें वापस ले ले मिरी ऐ रब
इससे मेरा ही कुछ भला होगा
जंग में मैं अकेला तो नहीं था
ख़ून तेरा भी तो बहा होगा
– अच्युतम यादव 'अबतर'
रंज-ओ-ग़म ही दिल में गूँजे तब भी अब भी
रह गए सपने अधूरे तब भी अब भी
ढूँढ लेता मैं ख़िज़ाँ में मौसम-ए-गुल
साथ गर तुम मेरा देते तब भी अब भी
बचपना ऐसा खिलौना है कि जिसको
खो दिया करते थे बच्चे तब भी अब भी
एक मुद्दत हो गई, कोई न आया
आए तो आँसू ही आए तब भी अब भी
तेरी बातों से नहीं लहजे से थे तंग
बातें तो हम मान लेते तब भी अब भी
ख़ूबसूरत कितने हैं रुख़्सार तेरे
थे सहर के रंग जैसे तब भी अब भी
– अच्युतम यादव 'अबतर'
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