एक महीने से भी ज़ियादा वक़्त बीत चुका था और अभी तक उस शख़्स का कोई अता-पता नहीं जिसने अमित की नानी को गाड़ी से टक्कर मारी थी। आज नानी जी को बिस्तर पर पड़े हुए एक महीना हो गया था और उनकी बाएँ तरफ़ का शरीर, जो इस दुर्घटना के बाद पैरालाइज़ हो गया था उसमें कोई सुधार नहीं हो रहा था। एक-एक करके गाँव के सभी लोग उन्हें देखने आते रहे और हर कोई सिर्फ़ इस बात की प्रशंसा ही करता था कि अमित की नानी ख़ुद कितनी दयालु हैं और क़िस्मत ने उनके साथ कितना अन्याय किया।
अमित के ननिहाल में कोई भी आर्थिक रूप से इतना सक्षम नहीं था कि नानी जी का इलाज किसी बड़े अस्पताल में करा सके। यह बात अमित को बहुत चुभती थी और ये कसक और बढ़ जाती थी ये सोचकर कि वो ख़ुद बीस साल का हो चुका है लेकिन अपनी नानी के लिए कुछ नहीं कर पा रहा है। पैसे की तंगी वक़्त के साथ-साथ और बढ़ती जा रही थी। कुछ न कर पाने की घुटन ने अमित के दिमाग़ में मानो कोई गहरा घाव कर दिया हो। वो किसी भी हाल में अपनी नानी के लिए पैसों का इंतज़ाम करना चाहता था। एक दिन उसने देखा कि उसके नाना जी चुपके से नानी के पास गए और उन्हें बेबस नज़रों से देखा और अपने गमछे से आँसू पोछते हुए कमरे से बाहर निकल आए। इस मंज़र ने अमित के मन में एक गहरा असर डाला। अमित ने ठान लिया कि वह कुछ करेगा और बहुत जल्द करेगा।
उसे अपने मित्र अनुभव से मालूम पड़ा कि गाँव में कोई मित्तल साहब हैं जो उसकी मदद कर सकते हैं। उसने अपने मामा से मित्तल साहब से मिलने की बात की। मामा ने मना कर दिया क्योंकि उन्होंने बताया कि वो ख़ुद उनसे आर्थिक सहायता माँग रहे थे लेकिन मित्तल साहब की भी कुछ मजबूरियाँ थीं जिनकी वजह से वो मदद नहीं कर सके। अमित को लगा कि मित्तल साहब ने मामा से झूठ बोला। उसे बहुत ग़ुस्सा भी आया और बेबसी के इस एहसास ने उसे इतना तोड़ दिया कि वो चोरी करने तक को तैयार हो गया। उसने ख़ुद से ये वादा किया कि नानी को बचाने के लिए अगर उसे बुरा बनना पड़ा तो वो बन जाएगा। अगर पाप से किसी की जान बचती हो तो क्या वह सच में पाप होता है? यह सवाल उसके अंदर बार-बार उठ रहा था।
उसका प्लान था कि वो रात में मित्तल साहब के घर में घुसकर कुछ पैसे चुराएगा और नानी का इलाज करवाएगा। वह इसकी और प्लानिंग करने लगा और रात के एक बजे अपने घर से निकलता है। मित्तल साहब के घर तक पहुँचने में उसे आधा घंटा लग जाता है। घर के आस-पास कोई नहीं था, सब लोग सो रहे थे। उस दिन घर के ज़ियादा-तर लोग बाहर चारपाई डालकर सो रहे थे क्यूँकि उस रात बहुत ही मीठी- मीठी हवा चल रही थी। अमित ने सोचा कि वो इसका फ़ायदा उठाके छत के ज़ीने से नीचे घर में उतरेगा। मित्तल साहब बहुत ही सुस्त आदमी थे और पूरे गाँव में वो इसीलिए बदनाम भी थे। इसका एक प्रमाण तब मिला जब अमित ने छत पर चढ़के ज़ीने का दरवाज़ा टूटा हुआ पाया। अमित आहिस्ता-आहिस्ता ज़ीने से उतरा और उतरते ही पहले ही कमरे में धीरे से घुसा। कमरे में ठीक-ठाक अँधेरा था। कमरे की ख़ामोशी उसे इस बात का एहसास दिला रही थी कि वो उस कमरे में अकेला था। अमित ने टॉर्च जलाई और टोर्च जैसे ही बाएँ तरफ़ की, उसे एक छोटी सी तिजोरी दिखी। उसे यक़ीन था कि पैसे उसी में रखे हैं। लेकिन वो तिजोरी इतनी मज़बूत थी कि उसे तोड़ने में बहुत वक़्त लगता। अचानक उसने नीचे से आती हुई कुछ आवाज़ें सुनी जिससे उसका चेहरा डर के मारे लाल पड़ गया। अमित के पास ज़ियादा वक़्त नहीं था मगर अमित भी पूरी तैयारी के साथ आया था। उसने फ़ौरन अपने साथ लाया हुआ क्ले तिजोरी के ताले में डाला और उसका आकार ले लिया ताकि वो उसकी चाबी बनवाके किसी दिन फिर आये और तिजोरी खोलके पैसे आसानी से चुरा सके।
लेकिन आकार लेके वो जैसे ही पीछे मुड़ा, डर के मारे उसका कलेजा मुँह को आ गया। उसके ठीक सामने कोई लेटा हुआ था। उसकी नज़र वहीं पर रखे एक स्टैंड पर पड़ी जिसमें शायद एक जूस की बोतल टँगी हुई थी। अमित ने हिम्मत करके टॉर्च चेहरे पर की। एक बूढ़ी औरत लेटी थी जिसका चेहरा किसी शाख़ से टूटे हुए ज़र्द पत्ते की तरह और जिसपे कमज़ोरी की नक़्क़ाशी से बनीं झुर्रियाँ साफ़ झलक रही थीं। पूरा बदन मानो जम सा गया था… कोई हरकत नहीं जबकि दोनों आँखें खुली थीं। उसे लगा कि अब वो पकड़ा जाएगा इसलिए वो हड़बड़ा गया और तुरंत उसी दरवाज़े से छत पर भाग गया और पीछे से उतरकर मित्तल साहब के घर से ठीक-ठाक दूर चला गया। सब कुछ उसके प्लान के मुताबिक़ गया लेकिन उसे डर था कि कहीं उस बूढ़ी औरत ने उसे पहचान तो नहीं लिया। वो घर लौटा और क्ले को संभाल कर रख दिया ताकि अगले दिन उसकी चाबी बनवा
सके।
सुबह उठने में उसे थोड़ी देर हो गई। उसने अपने घर में बहुत चहल-पहल देखी जो उसे बड़ी अजीब लगी। मामा से पूछने पर पता चला कि मित्तल साहब की माँ का बीती रात देहांत हो गया। अमित को ये सुनकर ऐसा महसूस हुआ कि बीती रात जिस बूढ़ी औरत को उसने देखा था शायद उसी का देहांत हुआ है। मामा से जब उसने वजह पूछी तो दोनों की आँखें नम हो गईं। दरअस्ल, मित्तल साहब की माँ भी अमित की नानी की तरह ही एक दुर्घटना के बाद लकवाग्रस्त हो गई थीं। उनके इलाज में बहुत ख़र्चा हुआ इसलिए मित्तल साहब के हाथ भी तंग चल रहे थे। उनकी माँ बहुत कम दिनों की ही मेहमान थीं और बीती रात उनकी इस संघर्ष का दुखदायी अंत हुआ। अमित ने अपनी नानी के बारे में सोचा और अब उसकी आँखों से आँसुओं की लहर और तेज़ हो गई। कहाँ उसने अपनी नानी को बचाने के लिए मित्तल साहब के घर में चोरी करने की सोची और आख़िरश ये मालूम हुआ कि मित्तल साहब की माँ भी उसकी नानी की तरह ही मौत से लड़ रही थीं।
उसने फ़ौरन उस तिजोरी के ताले की चाबी के आकार के क्ले को मसलकर फेंक दिया। उसे इंसानियत समझने का एक नया ज़ाविया मिला। दोपहर में वो अपने मामा के साथ मित्तल साहब का दुख बाँटने उनके के घर भी गया। पहली बार उसे मित्तल साहब में “दुश्मन” नहीं, बल्कि “अपने जैसा लाचार इंसान” दिखता है। उस वक़्त उसे ये महसूस हुआ कि मानो वो सिर्फ़ एक मातम में नहीं, बल्कि अपनी नीयत के जनाज़े में शामिल हुआ हो।
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