बग़ैर उस को बताए निभाना पड़ता है
ये 'इश्क़ राज़ है इस को छुपाना पड़ता है

मैं अपने ज़ेहन की ज़िद से बहुत परेशाँ हूँ
तिरे ख़याल की चौखट पे आना पड़ता है

तिरे बग़ैर ही अच्छे थे क्या मुसीबत है
ये कैसा प्यार है हर दिन जताना पड़ता है

ये 'इश्क़ एक जुआ है बताओ खेलोगे
समझ लो दाओ पे सब कुछ लगाना पड़ता है

हमारे हिज्र की मेहनत-कशी को मत देखो
शब-ए-विसाल का क़र्ज़ा चुकाना पड़ता है

हर आदमी से तबी'अत तो मिल नहीं सकती
मगर ये हाथ तो फिर भी मिलाना पड़ता है

- महशर आफ़रीदी