मैं हूँ ‘आबिद तो ने’मत से तुम और मिले भी हो मन्नत से तुम
दिल पे ख़ुद्दारी का ताला है
तोड़ के देखो दौलत से तुम !
बचना है मुझको तन्हाई से
हाथ थामो मोहब्बत से तुम
बुज़दिली खा गई हर हुनर
काम लेते थे हिम्मत से तुम
होगे गर मेरी क़िस्मत में तो
होगे आधा ज़रूरत से तुम
और मौक़े मिलेंगे मगर
हाथ धो बैठे बरकत से तुम
क्या है ‘अबतर’ में इतना अलग
देखते हो जो हैरत से तुम
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