मियाँ वो दिन गए अब ये हिमाक़त कौन करता है
वो क्या कहते हैं उस को हाँ मोहब्बत कौन करता है
ख़ुदा से चाहते हैं सब सिला अपनी सख़ावत का
किसी मजबूर पर यूँ ही 'इनायत कौन करता है
कभी सोचा है कैसे ख़ैरियत से घर पहुँचते हो
ये सब किस की दु'आएँ हैं हिफ़ाज़त कौन करता है
कोई ग़म से परेशाँ है कोई जन्नत का तालिब है
ग़रज़ सज्दे कराती है 'इबादत कौन करता है
गुनाहों के लिए इंसान ज़िम्मा-दार है बे-शक
मगर फिर भी बग़ैर उस की इजाज़त कौन करता है
- महशर आफ़रीदी
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