तमाम उम्र तेरा शुक्रिया अदा करता
फ़क़त गले से लगा कर ख़रीद सकते थे
अब इससे और भी सस्ता मैं ख़ुद को क्या करता
वो इतने प्यार से बोला कि चल बिछड़ जाएँ
मेरी मजाल मुहब्बत में अनकहा करता
दिल-ए-हज़ी को तेरे ज़िक्र से ही राहत थी
मैं शायरी नहीं करता तो और क्या करता
मैं एक बात के मानी तलाशता और वो
हर एक बात पे मौज़ू बदल दिया करता
- मनमौजी
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