9 Sad Ghazals in Hindi

दुखभरी ग़ज़लों का यह संकलन उन एहसासात को आवाज़ देता है, जो अक्सर दिल में दबे रह जाते हैं। टूटे हुए रिश्ते, अधूरी मोहब्बत, तन्हाई की टीस और ख़ामोशी के बोझ को बयाँ करती ये ग़ज़लें, हर उस दिल की कहानी कहती हैं जो सुकून की तलाश में है।

इस संग्रह "9 sad ghazals in hindi" में आपको दर्द, ग़म और जज़्बात की गहराइयों से निकली कुछ बेहद मार्मिक ग़ज़लें पढ़ने को मिलेंगी, जो न सिर्फ़ आपके ग़म को अलफ़ाज़ बल्कि उन्हें देखने के नए ज़ाविए भी देंगी। उम्मीद करता हूँ ये sad ghazals आपके दिल में घर कर पाए।


 Sad Ghazals in Hindi

ग़ज़ल 1
वो बरहमी गुलों से जता कर नहीं गया 
पर ख़ुशबुओं से हाथ मिला कर नहीं गया

बरसात से डरा हुआ वो तन्हा आदमी
काग़ज़ की कोई कश्ती बना कर नहीं गया

ये कैसे मानूँ मैं कि वो आएगा लौट कर
कोई दिलासा भी तो दिला कर नहीं गया

उस जाने वाले से ये गिला ही रहा कि वो
जाते हुए गले से लगा कर नहीं गया

उसके फ़िराक़ से फ़ज़ा भी ग़मज़दा हुई
तूफ़ाँ भी कोई पत्ता हिला कर नहीं गया

शायद मेरा भी दिल नहीं था एक होने का
वो भी कोई बहाना बना कर नहीं गया

‘अबतर’ थे मेरे पास सितारे कई मगर
मैं आसमान सर पे उठा कर नहीं गया
– अच्युतम यादव 'अबतर'
ग़ज़ल 2
चंद लफ़्ज़ों की ही कहानी थी
मेरे लहजे में इक रवानी थी

तुम ग़ज़ल सुन के चल पड़ी किस ओर
मुझको इक नज़्म भी सुनानी थी

जिस्म को राख करके क्या मिलता
अस्थियाँ रूह की बहानी थी

जिस दरीचे से आता है साया
उस दरीचे से धूप आनी थी

तन्हा तो इतना थे कि मत पूछो
अपनी अर्थी भी ख़ुद उठानी थी

साए थे ज़िंदगी के हम सब, और 
एक दिन रौशनी तो जानी थी

ख़बरें ज़हरीली बिकती थीं सो मुझे
शायरी से दवा बनानी थी 
– अच्युतम यादव 'अबतर'

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                                                            ग़ज़ल 3 
मानो मिल आए अजनबी से हम
जब मिले आज ज़िंदगी से हम

ख़ौफ़ खाते हैं ख़ुदकुशी से हम
क़र्ज़ लेते नहीं किसी से हम

दे सकेंगे फ़क़त उदासी ही
और वो देंगे नहीं ख़ुशी से हम

एक हसरत रही हमेशा से
तंग आए न शायरी से हम

इस अँधेरे से लड़ना तो होगा
हों भले दूर रौशनी से हम

आप जब पैदा भी नहीं हुए थे
शायरी करते थे तभी से हम
– अच्युतम यादव 'अबतर'
                                                            ग़ज़ल 4
तेरा चेहरा फूल जैसा हो गया
मेरा बेज़ारी का नक़्शा हो गया

हाथ तेरे लगने की देरी थी और
आदमी से मैं खिलौना हो गया

छिप-छिपाकर महँगी चीज़ें रखते हैं
अब ये आँसू कब से हीरा हो गया

आज मंज़िल ने तमाचा जड़ दिया
रस्ता जो टेढ़ा था सीधा हो गया

चाँद वैसे निकला था पूरा मगर
तुमको जब देखा तो आधा हो गया 

हिज्र के क़िस्सों को पढ़ते रहने से 
इश्क़ का इक्ज़ाम अच्छा हो गया

और कहीं तहरीर कर दो लफ़्ज़ों को
अब तो ये काग़ज़ भी बूढ़ा हो गया
– अच्युतम यादव 'अबतर'
                                                             ग़ज़ल 5
आँसुओं की नदी में गर जाना
रुकना मत सीधे पार कर जाना

गर मुकरना है तो मुकर जाना
बात लहजे की है, सुधर जाना

कुछ समझता नहीं था इश्क़ को मैं
जब हुआ मुझको तब असर जाना

जानते हो कि बोला क्या उसने !
‘मेरी आँखों को चूम कर जाना’

इतना ख़ुद्दार आदमी हूँ मैं 
मेरा मुश्किल ही है बिखर जाना

बस यही आम आदमी का है काम
आके दफ़्तर इधर-उधर जाना

कुछ गुलों तक ही था वो गुल महदूद
बाग़ से निकला तब शजर जाना
– अच्युतम यादव 'अबतर'
                                                            ग़ज़ल 6 
हमको तो कोई हमसफ़र न मिला
मिलना तो चाहिए था पर न मिला 

रंज तोहफ़े में सर-ब-सर न मिला
फिर भी हँस पाने का हुनर न मिला

ख़ुल्द में ढूँढ़कर निकालूँगा
मुझको धरती पे तू अगर न मिला

ज़ख़्म लहरों से कश्ती खाती रही
और किनारा भी रात भर न मिला

ज़ुल्म बेटों के सहने पड़ते हैं
घर में रहकर भी माँ को घर न मिला

ज़ोम है तीरगी को ख़ुद पे मगर
चाँदनी को भी आज दर न मिला
– अच्युतम यादव 'अबतर'
                                                             ग़ज़ल 7 
इतनी बरकत मुझे अता न करो
करना भी हो तो बारहा न करो

मैं ने कुछ बोला और चले गए तुम
इतनी सी बात पर सज़ा न करो

वो तुम्हारे ही राह की हों तो ठीक
हर मुसीबत का सामना न करो

तोड़ कर देखना जो कुछ भी मिले
रिश्तों में ऐसा बचपना न करो

अपनी मंज़िल पे मैं पहुँचता नहीं
मेरे नक़्श-ए-पा पे चला न करो

हिज्र से मुझको मर ही जाने दो
मेरे इस दर्द की दवा न करो

कुछ तो ख़ुद्दारी है अँधेरों में
रौशनी भीक में लिया न करो
– अच्युतम यादव 'अबतर'
                                                            ग़ज़ल 8 
हर सितारा भला निहाँ क्यूँ है
इतनी ग़ुर्बत में आसमाँ क्यूँ है

ग़म भला आपको मियाँ क्यूँ है
पूछा है आप से ही हाँ, क्यूँ है

दिल छिपाना था दिल के अंदर ही
तेरा दिल चेहरे से अयाँ क्यूँ है 

आतिशों से न खेला ज़िंदगी भर
फिर मिरी क़ब्र में धुआँ क्यूँ है

जब मुक़द्दर में फ़ासला नहीं था
फ़ासला अपने दरमियाँ क्यूँ है

होंगी आँखों से बारिशें लेकिन 
दिल के आँगन में ये ख़िज़ाँ क्यूँ है
– अच्युतम यादव 'अबतर'
                                                                  ग़ज़ल 9 
मरहले हो जाते हैं सब ख़ाक मेरी ज़िंदगी के
मैं तमाशे पे तमाशा देखता हूँ बेदिली के

कोई कितना भी हो सुन्दर, ख़ामियाँ होती हैं सब में
हद समझते क्यूँ नहीं हैं लोग इस जादूगरी के

ये भले ही फूल जैसे हों मगर धोका न खाना
भूलना मत ये कि ये बेटे हैं आख़िर ख़ार ही के

ख़ौफ़ खाते थे कभी ख़ुद ही समुंदर इससे लेकिन
काट डाले हैं किसी ने पाँव इस ज़िद्दी नदी के

तुमको तो बेज़ार होते देखा है मैंने मिरे दोस्त
क्यूँ गिनाए जा रहे हो फ़ायदे तुम आशिक़ी के
– अच्युतम यादव 'अबतर'
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