अकेलापन महज़ एक अहसास ही नहीं बल्कि एक ऐसी अवस्था है जिसमें आदमी बुरी तरह से टूट जाता है। तन्हाई इंसान को इंसान नहीं रहने देती। ये एहसास दिल को इतना भारी कर देता है कि किसी भी चीज़ में मन नहीं लगता। तन्हाई पर शायरी करना भी आसान नहीं क्योंकि शायर को अपना दिल कुरेद कर मिसरे बनाने पड़ते हैं।
शायरी तन्हाई को अल्फ़ाज़ देने का काम बा-ख़ूबी करती है और अगर आप शायरी में रुचि रखते हैं तो ये बात जानते ही होंगे। कई महान शायरों के कलाम में तन्हाई के एहसास का ज़िक्र मिलता है और वो भी बहुत दर्दनाक। अकेलेपन का एहसास सबसे बुरे एहसासात में से एक है। जब आपके पास कोई नहीं है जो आपकी बातें सुन सके, उसे समझ सके तो इंसान का दम घुटने लगता है।
तन्हाई कब सबसे ज़्यादा महसूस होती है?
शायद ये सवाल पूछना ही बेवकूफ़ी होगी। हर आदमी बता सकता है कि तन्हाई सबसे ज़्यादा रात में महसूस होती है। दिन तो जैसे तैसे बीत जाता है लेकिन रात में इस बात का एहसास होता है कि मुझे सुनने और समझने वाला तो कोई है ही नहीं। अकेलापन उस वक़्त भी बहुत ज़्यादा महसूस होता है जब हम किसी को औरों में घुलते-मिलते देखते हैं। ये लम्हा हमें अपने अकेलेपन का एहसास दिलाता है।
शायर तन्हाई पर क्यों लिखते हैं?
अपने मन में जो चल रहा है उसे जब भी लिखा जाता है तो अपने आप ही आदमी को सुकून मिलने लगता है। शायद यह एक बहुत बड़ी वजह है कि कवि और शायरी तन्हाई पर शायरी करते हैं। अपने दर्द को क़ागज़ पर उतारना आसान भी नहीं होता और अगर आप शायरी की बारीकियों से रू-ब-रू हैं तो आप जानते होंगे कि अपने दुख-दर्द को भी लय में लाना पड़ता है तब जाकर शायरी अपना असली रूप लेती है।
तो इस ब्लॉग पोस्ट में हमने अकेलेपन पर शायरी का ऐसा सिलसिला संजोया है, जहाँ हर शेर उस दर्द और ख़ामोशी को बयाँ करता है जो अक्सर हमारी रूह में दबा रह जाता है। नोट: इस पोस्ट में दी गई सभी शायरी लेखक द्वारा स्वयं लिखी गई हैं।
Shayari on Loneliness in Hindi
नाराज़गी किसी से जता कर नहीं गया
वो अपनी बे-दिली भी दिखा कर नहीं गया
बरसात से डरा हुआ वो तन्हा आदमी
काग़ज़ की कोई कश्ती बना कर नहीं गया
- अच्युतम यादव 'अबतर'
बचना है मुझको तन्हाई से
हाथ थामो मोहब्बत से तुम
- अच्युतम यादव 'अबतर'
कुछ गुलों तक ही था वो गुल महदूद
बाग़ से निकला तब शजर जाना
- अच्युतम यादव 'अबतर'
सिर्फ़ कहने को ही इंसाँ मानती है दुनिया वरना
ख़ाक भी था या नहीं ये वक़्त-ए-मातम तय करेगा
- अच्युतम यादव 'अबतर'
हमको तो कोई हमसफ़र न मिला
मिलना तो चाहिए था पर न मिला
- अच्युतम यादव 'अबतर'
हिज्र से मुझको मर ही जाने दो
मेरे इस दर्द की दवा न करो
- अच्युतम यादव 'अबतर'
हो सकता है रिश्ता न हो जनमों का हमारा
फिलहाल ये दीवार गिराने के लिए आ
- अच्युतम यादव 'अबतर'
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मुझसे छीना है इक हादसे ने उसे
वज्ह हर हिज्र की बेवफ़ाई नहीं
- अच्युतम यादव 'अबतर'
मैं अपने पे ही था जमी इक परत
मुझे मुझपे से ही हटाया गया
- अच्युतम यादव 'अबतर'
हुआ हर एक से झगड़ा हमारा
फ़क़त तुमसे ही है रिश्ता हमारा
- अच्युतम यादव 'अबतर'
वो मुझे छोड़ कर चल पड़ी इस तरह
जैसे इन आँखों को आँसू तन्हा करे
- अच्युतम यादव 'अबतर'
हम तुम्हारे नसीब में नहीं हैं
चल दिए लोग बोलकर मुझ को
- अच्युतम यादव 'अबतर'
सिर्फ़ ख़ामोशी ही है पड़ोसन मिरी
क़ब्र ही बन गया है अब अपना मकाँ
- अच्युतम यादव 'अबतर'
एक मुद्दत हो गई, कोई न आया
आए तो आँसू ही आए तब भी अब भी
- अच्युतम यादव 'अबतर'
ज़िंदगी में अकेले हैं जो भी
कौन उनसे भला ख़फ़ा होगा
- अच्युतम यादव 'अबतर'
अक्स मेरा है नहीं जिस में मुकम्मल
ज़िंदगी मानो उसी तस्वीर सी हो
- अच्युतम यादव 'अबतर'
दोस्तो, उम्मीद करता हूँ कि अभी तक आपको अकेलेपन पर मेरी शायरी पसंद आ रही होगी। मेरे कुछ चुनिंदा अश'आर के बाद आइए अब हम एक ग़ज़ल पढ़ते हैं जिसकी रदीफ़ 'तन्हाई' है।
ग़ज़ल
हर इक एहसास पर कुछ इस तरह तारी है तन्हाई
कि मजमे में भी मेरे साथ ही रहती है तन्हाई
मिलाना हर किसी की हाँ में हाँ बस की नहीं मेरे
मिरी ख़ातिर कहीं बेहतर परेशानी है तन्हाई
बनाके बज़्म इक काग़ज़ पे ख़ुद को ढूँढ़ता हूँ मैं
कोई पूछे तो कहता हूँ यही होती है तन्हाई
मैं इसका ग़म समझता हूँ सो मुझको ऐसा लगता है
कि इसकी ख़ुदकुशी की वज्ह हो सकती है तन्हाई
सहर से शाम तक तो रौशनी से लड़ती रहती है
शबों में फिर कहीं चुपके से रो लेती है तन्हाई
बचा था एक क़तरा अश्क का जो गिर पड़ा आख़िर
तिरे आँखों में अब ‘अबतर’ फ़क़त बाक़ी है तन्हाई
- अच्युतम यादव 'अबतर'तो दोस्तो, आशा करता हूँ कि आपको तन्हाई पर शायरी का ये संग्रह पसंद आया होगा। अगर ऐसा है तो कॉमेंट करके अपनी प्रतिक्रया ज़रूर दें। हमारे इस ब्लॉग पर अन्य विषयों पर भी शायरी कलेक्शन मौजूद है तो आप उन्हें भी पढ़ सकते हैं। अंत तक बने रहने के लिए आपका शुक्रिया।

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