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Prem Rupchandani

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Prem Rupchandani Ghazals

इसी को ही तो कहते हैं मशक़्क़त कर के देखो तुम
ज़रा इक बार को आओ मुहब्बत कर के देखो तुम

न तुम यूँ भूल पाओगे न तुमको याद आएगा
ख़ुदा को छोड़कर आओ बग़ावत कर के देखो तुम

ये सरगोशी ये ख़ामोशी ये बिन मतलब की बेहोशी
ग़म-ए-उल्फ़त में जीने की शहादत कर के देखो तुम

न ये समझो कि वो पागल न ये समझो मैं दीवाना
कोई शायर मिले तुमको रफ़ाक़त कर के देखो तुम

किसी से प्यार है तुम को किसी पे दिल गवारा है
उसी को पूछने की भी हिमाक़त कर के देखो तुम

ये छोड़ो दूसरों की रोशनी में घर बनाना अब
ज़रूरत है कि गुर्राओ हिक़ारत कर के देखो तुम

ख़ुशी का एक मौका या दुखों की ज़िंदगी गोया
घड़ीभर बैठकर सोचो तफ़ावत कर के देखो तुम

न बनती है बिगड़ती है इसी पर ज़ीस्त चलती है
कभी बाँटों कभी पाओ तिजारत कर के देखो तुम

जहालत के अँधेरों में छिपी है आड़ ग़ुर्बत की
सवालों को ही तुम अपनी विरासत कर के देखो तुम

चुभेगा भी धँसेगा भी वो काँटा जोर से इतना
मैं कहता हूँ लड़ो तुम भी वक़ालत कर के देखो तुम

सियासत की ये आदत है अँधेरे में रखेगी वो
सियासत-दान लोगों की मरम्मत कर के देखो तुम

यूँ घबराना यूँ शर्माना लड़कपन की निशानी है
उठो घनघोर आँधी पर हुकूमत कर के देखो तुम
– प्रेम रूपचंदानी
मौत पी जाने की हसरतें भी रहीं
और जी पाने की चाहतें भी रहीं

शोरगुल भी सहा पुर सुकूँ भी रहे
इस ज़माने से कुछ नफ़रतें भी रहीं

ख़ौफ़ था बात तक करने को ना मिली
यूँ दबी दिल में कुछ उल्फ़तें भी रहीं

मुख़्तलिफ़ सोच के दायरे में थे हम
वाक़ई जीने में ज़हमतें भी रहीं

ख़ैर हम बच गए राह में हर जगह
रौनकें भी रहीं रहमतें भी रहीं

क्यूँ डराया गया उस सफ़र ने हमें
हम चले तो हमें राहतें भी रहीं

रातभर जागते देर तक सोचते
आदतन कुछ बुरी आदतें भी रहीं

प्रेम है ज़िंदगी की वो दौलत जिसे
बाँटते ही गए बरकतें भी रहीं
– प्रेम रूपचंदानी
धीरे   धीरे   चढ़ा    ज़िंदगी   का   नशा
उसके  ऊपर   चढ़ा   शायरी  का  नशा

फ़ायदा  ही  नहीं   इश्क़  में  जब  कोई
क्यों चुना फिर वही आशिक़ी  का नशा

उम्रभर   एक   ही  कुर्ते  में   घूमे   हम
उस  सफ़ेदी  में  था  सादगी  का  नशा

दोस्तों   की   हयाती   ये   एहसास  है
सिर्फ़  यारी   ही  है  आदमी  का  नशा

वक़्त  बहने  लगा  इक  नदी  की तरह 
चढ़  गया  जब  हमें  बाँसुरी  का  नशा

प्रेमरस  जो  कोई   पी  गया  तर  गया
क्यों  करे फिर  कोई  चाशनी का नशा 

दिन  ढला  शब हुई  तो तलब  भी हुई
और   इक  मर्तबा   चाँदनी  का  नशा
– प्रेम रूपचंदानी
मैं इस तरह से ज़िंदगी गुज़ारता चला गया
मैं जीतता चला गया मैं हारता चला गया

वफ़ा के दौर में मुझे कहीं वफ़ा मिली नहीं
वफ़ा वफ़ा मैं राह में पुकारता चला गया

जमी हुई जो धूल थी शरीर पर पड़ी पड़ी
उखाड़ फेंक कर उसे बुहारता चला गया

ये छोड़ ने की चाह में जो छूटता नहीं है वो
वो एक ज़िंदगी का ग़म उतारता चला गया
– प्रेम रूपचंदानी
अब वो यादें भी पुरानी हो गई हैं
बीते लम्हों की कहानी हो गई हैं

कैद है रद्द-ए-‘अमल आँखों में उनका
उनकी बातें मुँह ज़ुबानी हो गई हैं

दो मुलाकातें मयस्सर थीं हमें बस
वो निगाहें जावेदानी हो गई हैं

सौ बरस के हो गए हैं हम यकायक
होते होते वो सियानी हो गई हैं

क्या कहें उनकी हया के बारे में हम
सज के जैसे सुर्मे-दानी हो गई हैं

वो हमारी एक-तरफ़ा थीं मुहब्बत
बंद बक्से में निशानी हो गई हैं

जिसमें थी वो यादें बातें फ़ोटो ग़ज़लें
सब किताबें राइगानी हो गई हैं

ज़िंदगी इस मोड़ पर आ कर रुकी है
ग़ज़लें ही अब ज़िंदगानी हो गई हैं

हम से मिलने आओ तो बस याद रखना
ज़ुल्फ़ें गहरी आसमानी हो गई हैं
– प्रेम रूपचंदानी
डर डर के  ज़िंदगी को  कुछ भी  नहीं मिला तो
शाखों   पे  सब्ज़   पत्ता   ख़ुद से नहीं हिला तो

उम्मीद  के  भरोसे   कब तक यूँ ही रहूँ मैं
सामान  साथ  तो  है   पर  जो  नहीं  बिका तो

कोनों में छुप के बैठूँ बच जाऊँ पर ये कब तक
ख़ुद को अगर ये इक भी मौका नहीं दिया तो
– प्रेम रूपचंदानी
उजलत  में हो रुको ज़रा 
इक  बात  मान  के चलो

बाज़ार  रोकता  है   क्या
सब कुछ है तान के चलो

ज़िंदादिली  सिखायेगी
आँखों में  ठान के  चलो

जो  पूछते  हैं   कौन  हो
सिंधी हैं  जान  के  चलो

हो इश्क़ में  नवीस तुम 
पागल हो मान के चलो
– प्रेम रूपचंदानी
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