Jaun Elia
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Ghazal
उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या
नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम
कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे
तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो
अपने सब यार काम कर रहे हैं
ये ग़म क्या दिल की 'आदत है नहीं तो
तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो
इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं
ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं
बे-दिली क्या यूँही दिन गुज़र जाएँगे
बे-क़रारी सी बे-क़रारी है
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