दोस्तो, उर्दू अदब में तहज़ीब हाफ़ी एक ऐसा मुक़ाम हासिल कर चुके हैं कि शायरी से प्यार करने वाले उनसे अच्छी तरह रू-ब-रू हैं। वो पाकिस्तान से आने वाले एक औला-तरीन और मक़बूल शायर हैं। तहज़ीब हाफ़ी की ग़ज़लें इतनी ख़ूबसूरत होती हैं कि एक बार आप पढ़ने या सुनने बैठें तो आँखें हटा नहीं सकते।
उनकी शायरी में रूमान सबसे अहम मौज़ूअ है और वो भी इतने सरल लफ़्ज़ों में कि सीधे दिल में घर कर जाए। आज हम तहज़ीब हाफ़ी की 10 चुनिंदा ग़ज़लें पढ़ेंगे और उनके सुख़न की दुनिया से रू-ब-रू होंगे।
तहज़ीब हाफ़ी की ग़ज़लें
पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा
मैं भीग जाऊँगा छतरी नहीं बनाऊँगा
अगर ख़ुदा ने बनाने का इख़्तियार दिया
अलम बनाऊँगा बर्छी नहीं बनाऊँगा
फ़रेब दे के तिरा जिस्म जीत लूँ लेकिन
मैं पेड़ काट के कश्ती नहीं बनाऊँगा
गली से कोई भी गुज़रे तो चौंक उठता हूँ
नए मकान में खिड़की नहीं बनाऊँगा
मैं दुश्मनों से अगर जंग जीत भी जाऊँ
तो उन की औरतें क़ैदी नहीं बनाऊँगा
तुम्हें पता तो चले बे-ज़बान चीज़ का दुख
मैं अब चराग़ की लौ ही नहीं बनाऊँगा
मैं एक फ़िल्म बनाऊँगा अपने 'सरवत' पर
और इस में रेल की पटरी नहीं बनाऊँगा
– तहज़ीब हाफ़ी
गले तो लगना है उस से कहो अभी लग जाए
यही न हो मेरा उस के बग़ैर जी लग जाए
मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं
तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए
तू हाथ उठा नहीं सकता तो मेरा हाथ पकड़
तुझे दुआ नहीं लगती तो शा'इरी लग जाए
पता करूँगा अँधेरे में किस से मिलता है
और इस अमल में मुझे चाहे आग भी लग जाए
– तहज़ीब हाफ़ी
मुसलसल वार करने पर भी ज़र्रा भर नहीं टूटा
मैं पत्थर हो गया फिर भी तेरा ख़ंजर नहीं टूटा
मुझे बर्बाद करने तक ही उस के आस्ताँ टूटे
मेरा दिल टूटने के बा'द उस का घर नहीं टूटा
हम उस का ग़म भला क़िस्मत पे कैसे टाल सकते हैं
हमारे हाथ में टूटा है वो गिरकर नहीं टूटा
सरों पर आसमाँ आँखों से आईने नज़र से दिल
बहुत कुछ टूट सकता था बहुत कुछ पर नहीं टूटा
तिलिस्म-ए-यार में जब भी कमी आई नमी आई
उन आँखों में जिन्हें लगता था जादूगर नहीं टूटा
तेरे भेजे हुए तेशों की धारें तेज़ थी 'हाफ़ी'
मगर इनसे ये कोह-ए-ग़म ज़ियादा तर नहीं टूटा
– तहज़ीब हाफ़ी
तेरा चुप रहना मिरे ज़ेहन में क्या बैठ गया
इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया
यूँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ
जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया
इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ
उस ने जिस जिस को भी जाने का कहा बैठ गया
अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं
चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया
उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने
इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया
बात दरियाओं की सूरज की न तेरी है यहाँ
दो क़दम जो भी मिरे साथ चला बैठ गया
बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस
जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया
– तहज़ीब हाफ़ी
इक तिरा हिज्र दाइमी है मुझे
वर्ना हर चीज़ आरज़ी है मुझे
एक साया मिरे तआक़ुब में
एक आवाज़ ढूँडती है मुझे
मेरी आँखों पे दो मुक़द्दस हाथ
ये अंधेरा भी रौशनी है मुझे
मैं सुख़न में हूँ उस जगह कि जहाँ
साँस लेना भी शाइरी है मुझे
इन परिंदों से बोलना सीखा
पेड़ से ख़ामुशी मिली है मुझे
मैं उसे कब का भूल-भाल चुका
ज़िंदगी है कि रो रही है मुझे
मैं कि काग़ज़ की एक कश्ती हूँ
पहली बारिश ही आख़िरी है मुझे
– तहज़ीब हाफ़ी
हम तुम्हारे ग़म से बाहर आ गए
हिज्र से बचने के मंतर आ गए
मैं ने तुम को अंदर आने का कहा
तुम तो मेरे दिल के अंदर आ गए
एक ही औरत को दुनिया मान कर
इतना घूमा हूँ कि चक्कर आ गए
इम्तिहान-ए-इश्क़ मुश्किल था मगर
नक्ल कर के अच्छे नंबर आ गए
तेरे कुछ आशिक़ तो गंगाराम हैं
और जो बाक़ी थे निश्तर आ गए
– तहज़ीब हाफ़ी
नहीं था अपना मगर फिर भी अपना अपना लगा
किसी से मिल के बहुत देर बा'द अच्छा लगा
तुम्हें लगा था मैं मर जाऊँगा तुम्हारे बग़ैर
बताओ फिर तुम्हें मेरा मज़ाक़ कैसा लगा
तिजोरियों पे नज़र और लोग रखते हैं
मैं आसमान चुरा लूँगा जब भी मौक़ा लगा
दिखाती है भरी अलमारियाँ बड़े दिल से
बताती है कि मोहब्बत में किस का कितना लगा
– तहज़ीब हाफ़ी
जब से उस ने खींचा है खिड़की का पर्दा एक तरफ़
उस का कमरा एक तरफ़ है बाक़ी दुनिया एक तरफ़
मैं ने अब तक जितने भी लोगों में ख़ुद को बाँटा है
बचपन से रखता आया हूँ तेरा हिस्सा एक तरफ़
एक तरफ़ मुझे जल्दी है उस के दिल में घर करने की
एक तरफ़ वो कर देता है रफ़्ता रफ़्ता एक तरफ़
यूँ तो आज भी तेरा दुख दिल दहला देता है लेकिन
तुझ से जुदा होने के बा'द का पहला हफ़्ता एक तरफ़
उस की आँखों ने मुझ से मेरी ख़ुद्दारी छीनी वरना
पाँव की ठोकर से कर देता था मैं दुनिया एक तरफ़
मेरी मर्ज़ी थी मैं ज़र्रे चुनता या लहरें चुनता
उस ने सहरा एक तरफ़ रक्खा और दरिया एक तरफ़
– तहज़ीब हाफ़ी
तू ने क्या क़िंदील जला दी शहज़ादी
सुर्ख़ हुई जाती है वादी शहज़ादी
शीश-महल को साफ़ किया तिरे कहने पर
आईनों से गर्द हटा दी शहज़ादी
अब तो ख़्वाब-कदे से बाहर पाँव रख
लौट गए हैं सब फ़रियादी शहज़ादी
तेरे ही कहने पर एक सिपाही ने
अपने घर को आग लगा दी शहज़ादी
मैं तेरे दुश्मन लश्कर का शहज़ादा
कैसे मुमकिन है ये शादी शहज़ादी
– तहज़ीब हाफ़ी
क्या ग़लतफ़हमी में रह जाने का सदमा कुछ नहीं
वो मुझे समझा तो सकता था कि ऐसा कुछ नहीं
इश्क़ से बच कर भी बंदा कुछ नहीं होता मगर
ये भी सच है इश्क़ में बंदे का बचता कुछ नहीं
जाने कैसे राज़ सीने में लिए बैठा है वो
ज़ह्र खा लेता है पर मुँह से उगलता कुछ नहीं
शुक्र है कि उस ने मुझ से कह दिया कि कुछ तो है
मैं उस से कहने ही वाला था कि अच्छा कुछ नहीं
– तहज़ीब हाफ़ी
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