आँखों में धूल, अक़्ल पे पत्थर पड़े रहे
तूफाँ का ख़ौफ़ दिल में कुछ ऐसे समा गया
पत्ते हवा की जुंबिशों से काँपते रहे
उनकी नज़र के कितने मनाज़िर थे मुंतज़िर
लेकिन वो सिर्फ़ मेरी तरफ़ ताकते रहे
हम उनकी बद्दुआ के भी क़ाबिल नहीं थे दोस्त
और वो हमारे हक़ में दुआ माँगते रहे
वाक़िफ़ तो थे कि शाम ढले लौटना भी है
ख़ुश-फ़हमियों में सरहदों को लाँघते रहे
ख़ुदसर हैं, ख़ुद ग़रज़ भी हैं 'मौजी हक़ीक़तन
वैसे नहीं थे जैसे तेरे वास्ते रहे
- मनमौजी
0 टिप्पणियाँ