Aditya Singh 'aadi' Shayari Collection

कम उम्र में शे'र कहना कोई बड़ी बात नहीं लेकिन मुख़्तलिफ़ एहसासात को दर्शाना और पाठकों के दिल में जगह बनाना बहुत मुश्किल काम है। आदित्य सिंह उन्हीं शायरों की फ़ेहरिस्त में शुमार हैं। आदित्य सिंह की शायरी में जो पैनापन है वो इस शायर को बाक़ी शायरों से अलग बनाता है। जिस सलीक़े से ये ग़ज़ल कहते हैं ऐसा मालूम पड़ता है मानो इन्हें एक दशक का तजरबा हो और ये चीज़ इनकी शायरी में ख़ूब झलकती है।

आज हम आदित्य सिंह की शायरी से चुनिंदा ग़ज़लें लेकर आए हैं जिनमें एक ऐसी कशिश है जो आपका दिल जीत लेगी। 

 आदित्य सिंह की ग़ज़लें 

तू चांँद है तो चांँद के धब्बों की तरह मैं
पर चाहता हूंँ तुझको चकोरों की तरह मैं

खिलती है किसी शाख़ पे फूलों की तरह तू
उगता हूँ किसी झाड़ में कांँटो की तरह मैं

दिल भरते ही घर के किसी कोने में मिलूंँगा
बच्चों के पसंदीदा खिलौनों की तरह मैं

लूटा भी गया हूँ कभी छीना भी गया हूँ
ख़ैरात में बँटते हुए सिक्कों की तरह मैं

चुपचाप खड़ा देखता रहता है मुझे तू
झड़ता हूँ तेरी शाख़ से पत्तों की तरह मैं
– आदित्य सिंह
वो जो मालिक हैं सभी के वो शिफ़ा देंगे तुम्हें
इन दुआओं के सिवा दूर से क्या देंगे तुम्हें

जब भी चाहेंगे बहा लेंगे ज़रा से आँसू
जब भी चाहेंगे निगाहों से गिरा देंगे तुम्हें

क्या सितम है वही इक रोज़ नहीं आता है
सोचते रोज़ हैं इक रोज़ भुला देंगे तुम्हें

गाँव की सड़कें बता देंगी हमारी हालत
सूखते पेड़ इशारों से पता देंगे तुम्हें

हम जो चाहें वो ख़ुदा ही हमें दे सकता है
तुम जो चाहोगे वो मांँ बाप दिला देंगे तुम्हें

लोग जो मिलते हैं हँसता हुआ चेहरा ले कर
इन से बचना कि यही लोग रुला देंगे तुम्हें
– आदित्य सिंह
घड़ी से लाख महँगा तो घड़ी का वक़्त होता है
जो इसकी क़द्र करता है उसी का वक़्त होता है

सितम ये है कि हम जैसे ग़रीबों की कलाई में
घड़ी होती किसी की है किसी का वक़्त होता है

यही वो उम्र है जब चाह कर भी मर नहीं सकते
यही वो उम्र है जब ख़ुदकुशी का वक़्त होता है

उन्हें कहना कि रातों में हमें भी नींद आती है
उन्हें कहना हमारी नौकरी का वक़्त होता है

जकड़ लेती है पैरों को हमारे गाँव की मिट्टी
दुबारा शहर को जब वापसी का वक़्त होता है

उदासी लुत्फ़ लेने को चली आती है महलों से
हमारी झोपड़ी में जब ख़ुशी का वक़्त होता है
– आदित्य सिंह
वो मेरे ख़्वाब की लड़की जो गुम-शुदा है कहीं
उसी की खोज में ये दिल भी लापता है कहीं

ख़ुदा के वास्ते मत कीजिए ख़ुदा की बात
कई दिनों से कहीं मैं हूँ और ख़ुदा है कहीं

मुझे ये डर है निशाने पे दिल न हो उसका
कि मेरा तीर अँधेरे में जा लगा है कहीं

न जाने कब वो उठाएगा और तराशेगा
मेरे नसीब का पत्थर पड़ा हुआ है कहीं

जो बात बात पे कहता था गाँव जन्नत है
ख़बर मिली है वो अब शहर में बसा है कहीं

तेरे सभी सर-ओ-सामान से ये लगता है
तू इस मकान से पहले भी रह चुका है कहीं

इसी फ़िराक़ में हर शख़्स हो गया आदी
कि आशिक़ी से भी बढ़कर कोई नशा है कहीं
– आदित्य सिंह
ख़ूब आता है तअल्लुक़ को निभाना उसको
जो मिलेगा वो बना लेगी दिवाना उसको

उसने ख़ुद ही मुझे मजबूर किया है वरना
चाहता कौन था यूँ छोड़ के जाना उसको

मेरी तस्वीर जो सीने से लगा बैठी है
मेरी बिगड़ी हुई तक़दीर दिखाना उसको

मैं तेरे शहर में मशहूर नहीं हूँ फिर भी
कोई पूछे तो मेरा नाम बताना उसको

इससे बढ़कर मैं उसे और सज़ा क्या दूँगा
याद रक्खेगा मेरे साथ ज़माना उसको
– आदित्य सिंह
देर वीराने में आवाज़ लगाते रहे हम
उस को आना नहीं था फिर भी बुलाते रहे हम

माँगने वालो को बस दी हैं दुआएँ हमने
लूटने वालो पे तो जान लुटाते रहे हम

गिर गई गोद में चुप के से बुढ़ापे की हयात
हिज्र बचपन का जवानी में मनाते रहे हम

उस हथेली से उतर भी गया मेंहदी का रंग
अपने दामन से वो इक दाग़ मिटाते रहे हम

मौत की रस्सी का गर्दन में फँसा कर फंदा
ज़िंदगी नाम के दरिया में नहाते रहे हम
– आदित्य सिंह
निकली किसी कमान से दिल में मेरे उतर गई
एक ही हादसे में वो मुझको तबाह कर गई

कैसे कहूँ मैं हाथों में फूल लिए खड़ा रहा
कैसे कहूँ कि वो मेरे सामने से गुज़र गई

अब इसे हादसा कहें या कहें इत्तिफ़ाक़ हम
सामने थे कई मगर आप ही पे नज़र गई

आए थे अपनी मर्ज़ी से मिलने तू और मैं मगर
मैं तेरे कहने पर गया तू मेरे कहने पर गई

सालों के बाद आज जब मिलना हुआ तो यूँ हुआ
मैंने भी मुस्कुरा दिया उसकी भी आँख भर गई
– आदित्य सिंह
हाल मजनूँ सा बनाओ जाओ
दश्त में ख़ाक उड़ाओ जाओ

मरहमों को ये इजाज़त दी है
ज़ख़्म का हाथ बटाओ जाओ

घर कहीं और बसा लो लेकिन
दिल तुम्हारा ही है आओ जाओ

अब मिरी लाश में क्या रक्खा है
ख़ाक में ख़ाक मिलाओ जाओ

वक़्त बर्बाद हुआ जाता है
काम की बात बताओ जाओ

मुझको बर्बाद बताने वालों
अपनी औलाद बचाओ जाओ

खिड़कियाँ याद किया करती हैं
घर तुम्हारा है तो आओ जाओ

मै कहीं और लगा लूँगा दिल
तुम कहीं और लगाओ जाओ
– आदित्य सिंह
अपने ही आप में मुब्तिला हूँ
बंद कमरे में जलता दिया हूँ

जुगनुओं को इशारा किया है
इन सितारों को अब देखता हूँ

लोग इस बात पर हँस रहे हैं
मैं किसी बात पर रो रहा हूँ

गर ख़ुदा की तरफ़ हो इशारा
देखिएगा किधर देखता हूँ

दूसरा रास्ता ही नहीं था
आपके दिल से होकर गया हूँ

आज उसने मेरा दाम पूछा
इसलिए ख़ूब महँगा बिका हूँ

इक फ़क़त नाक ही दरमियाँ है
होंठ से होंठ का फ़ासला हूँ
– आदित्य सिंह
ज़िंदगी को आख़िरी ज़िल्लत मिली है
मर गया हूँ तो बड़ी इज़्ज़त मिली है

दिल सभी पर आ गया तो क्या करूँ मैं
एक ही सामान की क़ीमत मिली है

ज़िंदगी को मौत ने रुख़सत किया है
रूह को अब जिस्म से फ़ुर्सत मिली है

आज से वो हो गई इज़्ज़त किसी की
आज मिट्टी में मेरी इज़्ज़त मिली है

इस जनम में तो असंभव है मरम्मत
जिस क़दर फूटी हुई क़िस्मत मिली है
– आदित्य सिंह
ये थीं आदित्य सिंह की चुनिंदा ग़ज़लें। उम्मीद करते हैं कि आपको आदित्य सिंह का ये शायरी संग्रह पसंद आया होगा। अपना पसंदीदा शे'र या ग़ज़ल कॉमेंट करके ज़रूर बताएँ। हमारे ब्लॉग पर कई शायरों का शायरी संग्रह मौजूद है। आप उन्हें भी पढ़ सकते हैं।