ग़ज़ल में होने वाली आम ग़लतियाँ

दोस्तो, हमने
'ग़ज़ल कैसे लिखें' की सीरीज़ में ग़ज़ल की बारीकियों को समझा है। उम्मीद करता हूँ कि आप ने उन ब्लॉग पोस्ट्स से बहुत कुछ नया सीखा होगा। इसी series में एक और बेहद अहम सवाल नए शायरों के ज़ेहन में आता है और वो ये है कि ग़ज़ल में होने वाली आम ग़लतियाँ क्या हैं और हम कैसे उन ग़लतियों से बच सकते हैं? बात बिल्कुल साफ़ है कि हमें अपने basics मज़बूत करने हैं और हम वो ज़रूर करेंगे। 

तो अगर आप भी ग़ज़ल कहना सीख रहे हैं तो ये ग़लतियाँ आप से भी हो सकती हैं इसलिए आज हम इस पोस्ट में उन्हीं पर बात करेंगे। इनमें कुछ ग़लतियाँ ऐसी भी हैं जो ग़ज़ल की समझ रखने वालों से भी जाने-अनजाने में हो जाती हैं। तो चलिए अब हम उन ग़लतियों को देखते हैं।

क़ाफ़िया और रदीफ़ की ग़लती

पहली और सबसे ज़ियादा ग़लतियाँ होने की गुंजाइश क़ाफ़िया और रदीफ़ में होती है। कुछ ग़लतियों के उदाहरण हैं ऐसे शब्द को क़ाफ़िया लेना जिसके हम-क़ाफ़िए न हों या आसानी से न मिलें। ध्यान रखें कि ग़ज़ल बिना रदीफ़ के हो सकती है (ग़ैर-मुरद्दफ़ ग़ज़ल) लेकिन बिना क़ाफ़िए के ग़ज़ल नहीं हो सकती। अक्सर ज़ियादातर ग़लतियाँ क़ाफ़िए से ही जुड़ी होती हैं इसलिए इस बात का ख़ास ख़याल पहले से ही दिमाग़ में रखें। मैंने एक पूरा ब्लॉग पोस्ट क़ाफ़िए के नियम पर लिखा है जिसे आप ज़रूर पढ़ें। उस पोस्ट में मैंने detail में क़ाफ़िए के नियम व दोष समझाए हैं। ठीक उसी तरह रदीफ़ के नियम व दोष भी एक अलग पोस्ट में detail में समझाए हैं।

मात्रा गणना में ग़लती

अगर आप ग़ज़ल कहना अभी-अभी शुरू किए हैं तो मात्रा गणना आपके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। नए शायर क्या वो जिन्हें मात्रा गणना के नियम मालूम है उनसे भी कभी-कभी ग़लती हो जाती है। मैं साफ़-साफ़ कहूँ तो आपको अगर ग़ज़ल सीखनी है तो इस चुनौती को मश्क़ और धैर्य के साथ पार करना होगा। सबसे बड़ी दिक़्क़त यह है कि मात्रा गणना से ही ग़ज़ल की लय निर्धारित होती है इसलिए यह बहुत ही अहम हिस्सा है ग़ज़ल का। मैंने मात्रा गणना के नियम पर एक पोस्ट लिखी है जो आप पढ़ सकते हैं। 

स्पेलिंग की ग़लती

अगर आपको सही तरह से ग़ज़ल सीखना है तो शब्दों की स्पेलिंग की जानकारी होना बहुत ज़रूरी है। अक्सर 'इ' की मात्रा की जगह लोग 'ई' की मात्रा लगा देते हैं और कभी ठीक इसका उल्टा। जब भी आप ग़ज़ल लिख रहे हों या कुछ भी लिख रहे हों तो एक नुक़्ता भी ग़लत न हो तो बहुत अच्छी बात होगी। आपको हमेशा कोशिश करनी है कि आप अपनी हिंदी और उर्दू vocabulary को लगातार बढ़ाते रहें। इसके लिए आप जितना हो सके उतनी ग़ज़लें पढ़ें और उनमें इस्तेमाल हुए अलफ़ाज़ को ध्यान से देखें। एक अच्छा पाठक बनना बहुत ज़रूरी है अगर आप स्पेलिंग की ग़लतियों से बचना चाहते हैं।

तलफ़्फ़ुज़ (pronunciation) की ग़लती

तलफ़्फ़ुज़ का अर्थ है 'शब्दों का उच्चारण।' ऐसा बहुत देखा जाता है कि शायर लिखते वक़्त शब्दों की स्पेलिंग सही लिखते हैं लेकिन जब उन्हीं शब्दों के उच्चारण की बात हो तो उमूमन ग़लती कर बैठते हैं। इसमें सबसे ज़ियादा ग़लतियाँ होती हैं उन शब्दों में जिनमें नुक़्ता लगे होते हैं। 'ज़' की जगह 'ज' पढ़ना बहुत आम है और आप इस तरह की ग़लतियाँ अपनी रोज़मर्रा ज़िंदगी में बहुत देखते होंगे। बाकियों की ग़लतियाँ छोड़ें सिर्फ़ अपनी देखें क्योंकि हमें एक अच्छा शायर बनना है और इसके लिए हमें तलफ़्फ़ुज़ पर काम करते रहना है। छोटी से छोटी ग़लतियों से बचना है जैसे 'करीब' नहीं 'क़रीब' सही लफ़्ज़ है, 'वक्त' नहीं 'वक़्त' सही लफ़्ज़ है।

लय बिगड़ना

लय ग़ज़ल का बहुत ही ज़रूरी भाग है। अगर ग़ज़ल में लय नहीं है तो फिर उसमें मज़ा नहीं आता। लय के लिए हमें ध्यान रखना है कि हम ज़ियादा मात्रा न गिराएँ। बहुत ज़ियादा मात्रा गिराने से ग़ज़ल की लय बिगड़ सकती है इसलिए कम से कम मात्रा गिराएँ। ध्यान रखें कि मात्रा गिराना एक छूट है, यह कोई नियम नहीं है इसलिए इसका इस्तेमाल ध्यानपूर्वक करें। हालाँकि मात्रा गिराने की छूट लेना इतनी आम बात है कि इसके लिए भी नियम बना दिए गए हैं। मैंने मात्रा गिराने के नियम पर भी एक पोस्ट लिखी है जिसे आप पढ़ सकते हैं। 

तो दोस्तो, ये थीं वो 5 आम ग़लतियाँ जो नए शायर उमूमन करते हैं। उम्मीद करता हूँ कि अब आप इन ग़लतियों पर ध्यान देंगे ताकि आपकी ग़ज़ल दुरुस्त हो सके। जिन बातों को मैंने अलग पोस्ट में समझाया है उनके links मैंने ऊपर दे दिए हैं ताकि आप को ज़ियादा परेशानी न हो। 

हम इसी तरह शायरी से जुड़ी बारीकियाँ अपने इस ब्लॉग पर प्रकाशित करते रहते हैं। अगर आप चाहें तो शायरी से जुड़ी अन्य posts भी पढ़ सकते हैं। आप हमारी सीरीज़ "ग़ज़ल कैसे लिखें" भी पढ़े सकते हैं ताकि आप ग़ज़ल से जुड़े नियम समझ सकें। अंत तक बने रहने के लिए आपका शुक्रिया।