दोस्तो, आज हम जिस शायर का कलाम लेकर आए हैं उनका नाम है तहज़ीब हाफ़ी। आपने ये नाम तो ज़रूर सुना होगा और क्यों नहीं सुना होगा, तहज़ीब हाफ़ी की शायरी में जो भाव हैं वो इतने गहरे होते हैं कि दिल से अपने आप ही वाह निकलता है। आज इस पोस्ट में हम तहज़ीब हाफ़ी का ग़ज़ल संग्रह लेकर आए हैं। उम्मीद करते हैं आपको पसंद आएगी।
तहज़ीब हाफ़ी की ग़ज़लें
तेरा चुप रहना मिरे ज़ेहन में क्या बैठ गया
इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया
यूँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ
जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया
इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ
उस ने जिस जिस को भी जाने का कहा बैठ गया
अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं
चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया
उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने
इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया
बात दरियाओं की सूरज की न तेरी है यहाँ
दो क़दम जो भी मिरे साथ चला बैठ गया
बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस
जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया
– तहज़ीब हाफ़ी
ये एक बात समझने में रात हो गई है
मैं उस से जीत गया हूँ कि मात हो गई है
मैं अब के साल परिंदों का दिन मनाऊँगा
मिरी क़रीब के जंगल से बात हो गई है
बिछड़ के तुझ से न ख़ुश रह सकूँगा सोचा था
तिरी जुदाई ही वज्ह-ए-नशात हो गई है
बदन में एक तरफ़ दिन तुलूअ' मैं ने किया
बदन के दूसरे हिस्से में रात हो गई है
मैं जंगलों की तरफ़ चल पड़ा हूँ छोड़ के घर
ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है
रहेगा याद मदीने से वापसी का सफ़र
मैं नज़्म लिखने लगा था कि ना'त हो गई है
– तहज़ीब हाफ़ी
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पराई आग पे रोटी नहीं बनाऊँगा
मैं भीग जाऊँगा छतरी नहीं बनाऊँगा
अगर ख़ुदा ने बनाने का इख़्तियार दिया
अलम बनाऊँगा बर्छी नहीं बनाऊँगा
फ़रेब दे के तिरा जिस्म जीत लूँ लेकिन
मैं पेड़ काट के कश्ती नहीं बनाऊँगा
गली से कोई भी गुज़रे तो चौंक उठता हूँ
नए मकान में खिड़की नहीं बनाऊँगा
मैं दुश्मनों से अगर जंग जीत भी जाऊँ
तो उन की औरतें क़ैदी नहीं बनाऊँगा
तुम्हें पता तो चले बे-ज़बान चीज़ का दुख
मैं अब चराग़ की लौ ही नहीं बनाऊँगा
मैं एक फ़िल्म बनाऊँगा अपने 'सरवत' पर
और इस में रेल की पटरी नहीं बनाऊँगा
– तहज़ीब हाफ़ी
बता ऐ अब्र मुसावात क्यूँ नहीं करता
हमारे गाँव में बरसात क्यूँ नहीं करता
महाज़-ए-इश्क़ से कब कौन बच के निकला है
तू बच गया है तो ख़ैरात क्यूँ नहीं करता
वो जिस की छाँव में पच्चीस साल गुज़रे हैं
वो पेड़ मुझ से कोई बात क्यूँ नहीं करता
मैं जिस के साथ कई दिन गुज़ार आया हूँ
वो मेरे साथ बसर रात क्यूँ नहीं करता
मुझे तू जान से बढ़ कर अज़ीज़ हो गया है
तो मेरे साथ कोई हाथ क्यूँ नहीं करता
– तहज़ीब हाफ़ी
जब उस की तस्वीर बनाया करता था
कमरा रंगों से भर जाया करता था
पेड़ मुझे हसरत से देखा करते थे
मैं जंगल में पानी लाया करता था
थक जाता था बादल साया करते करते
और फिर मैं बादल पे साया करता था
बैठा रहता था साहिल पे सारा दिन
दरिया मुझ से जान छुड़ाया करता था
बिंत-ए-सहरा रूठा करती थी मुझ से
मैं सहरा से रेत चुराया करता था
– तहज़ीब हाफ़ी
सो रहेंगे कि जागते रहेंगे
हम तिरे ख़्वाब देखते रहेंगे
तू कहीं और ढूँढता रहेगा
हम कहीं और ही खिले रहेंगे
राहगीरों ने रह बदलनी है
पेड़ अपनी जगह खड़े रहे हैं
बर्फ़ पिघलेगी और पहाड़ों में
सालहा-साल रास्ते रहेंगे
सभी मौसम हैं दस्तरस में तिरी
तू ने चाहा तो हम हरे रहेंगे
लौटना कब है तू ने पर तुझ को
आदतन ही पुकारते रहेंगे
तुझ को पाने में मसअला ये है
तुझ को खोने के वसवसे रहेंगे
तू इधर देख मुझ से बातें कर
यार चश्मे तो फूटते रहेंगे
– तहज़ीब हाफ़ी
इक तिरा हिज्र दाइमी है मुझे
वर्ना हर चीज़ आरज़ी है मुझे
एक साया मिरे तआक़ुब में
एक आवाज़ ढूँडती है मुझे
मेरी आँखों पे दो मुक़द्दस हाथ
ये अंधेरा भी रौशनी है मुझे
मैं सुख़न में हूँ उस जगह कि जहाँ
साँस लेना भी शाइरी है मुझे
इन परिंदों से बोलना सीखा
पेड़ से ख़ामुशी मिली है मुझे
मैं उसे कब का भूल-भाल चुका
ज़िंदगी है कि रो रही है मुझे
मैं कि काग़ज़ की एक कश्ती हूँ
पहली बारिश ही आख़िरी है मुझे
– तहज़ीब हाफ़ी
अजीब ख़्वाब था उस के बदन में काई थी
वो इक परी जो मुझे सब्ज़ करने आई थी
वो इक चराग़-कदा जिस में कुछ नहीं था मिरा
जो जल रही थी वो क़िंदील भी पराई थी
न जाने कितने परिंदों ने इस में शिरकत की
कल एक पेड़ की तक़रीब-ए-रू-नुमाई थी
हवाव आओ मिरे गाँव की तरफ़ देखो
जहाँ ये रेत है पहले यहाँ तराई थी
किसी सिपाह ने ख़ेमे लगा दिए हैं वहाँ
जहाँ पे मैं ने निशानी तिरी दबाई थी
गले मिला था कभी दुख भरे दिसम्बर से
मिरे वजूद के अंदर भी धुँद छाई थी
– तहज़ीब हाफ़ी
इस एक डर से ख़्वाब देखता नहीं
जो देखता हूँ मैं वो भूलता नहीं
किसी मुंडेर पर कोई दिया जिला
फिर इस के बाद क्या हुआ पता नहीं
मैं आ रहा था रास्ते मैं फूल थे
मैं जा रहा हूँ कोई रोकता नहीं
तिरी तरफ़ चले तो उम्र कट गई
ये और बात रास्ता कटा नहीं
इस अज़दहे की आँख पूछती रही
किसी को ख़ौफ़ आ रहा है या नहीं
मैं इन दिनों हूँ ख़ुद से इतना बे-ख़बर
मैं बुझ चुका हूँ और मुझे पता नहीं
ये इश्क़ भी अजब कि एक शख़्स से
मुझे लगा कि हो गया हुआ नहीं
– तहज़ीब हाफ़ी
चेहरा देखें तेरे होंट और पलकें देखें
दिल पे आँखें रक्खें तेरी साँसें देखें
सुर्ख़ लबों से सब्ज़ दुआएँ फूटी हैं
पीले फूलों तुम को नीली आँखें देखें
साल होने को आया है वो कब लौटेगा
आओ खेत की सैर को निकलें कूजें देखें
थोड़ी देर में जंगल हम को आक़ करेगा
बरगद देखें या बरगद की शाख़ें देखें
मेरे मालिक आप तो सब कुछ कर सकते हैं
साथ चलें हम और दुनिया की आँखें देखें
हम तेरे होंटों की लर्ज़िश कब भूले हैं
पानी में पत्थर फेंकें और लहरें देखें
– तहज़ीब हाफ़ी
इक हवेली हूँ उस का दर भी हूँ
ख़ुद ही आँगन ख़ुद ही शजर भी हूँ
अपनी मस्ती में बहता दरिया हूँ
मैं किनारा भी हूँ भँवर भी हूँ
आसमाँ और ज़मीं की वुसअत देख
मैं इधर भी हूँ और उधर भी हूँ
ख़ुद ही मैं ख़ुद को लिख रहा हूँ ख़त
और मैं अपना नामा-बर भी हूँ
दास्ताँ हूँ मैं इक तवील मगर
तू जो सुन ले तो मुख़्तसर भी हूँ
एक फलदार पेड़ हूँ लेकिन
वक़्त आने पे बे-समर भी हूँ
– तहज़ीब हाफ़ी
कुछ ज़रूरत से कम किया गया है
तेरे जाने का ग़म किया गया है
ता-क़यामत हरे भरे रहेंगे
इन दरख़्तों पे दम किया गया है
इस लिए रौशनी में ठंडक है
कुछ चराग़ों को नम किया गया है
क्या ये कम है कि आख़िरी बोसा
उस जबीं पर रक़म किया गया है
पानियों को भी ख़्वाब आने लगे
अश्क दरिया में ज़म किया गया है
उन की आँखों का तज़्किरा कर के
मेरी आँखों को नम किया गया है
धूल में अट गए हैं सारे ग़ज़ाल
इतनी शिद्दत से रम किया गया है
– तहज़ीब हाफ़ी
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सब की कहानी एक तरफ़ है मेरा क़िस्सा एक तरफ़
एक तरफ़ सैराब हैं सारे और मैं प्यासा एक तरफ़
एक तरफ़ तुम्हें जल्दी है उस के दिल में घर करने की
एक तरफ़ वो कर देता है रफ़्ता रफ़्ता एक तरफ़
मेरी मर्ज़ी थी मैं ज़र्रे चुनता या लहरें चुनता
उस ने सहरा एक तरफ़ रखा और दरिया एक तरफ़
मैं ने अब तक जितने भी लोगों में ख़ूद को बाँटा है
बचपन से रखता आया हूँ तेरा हिस्सा एक तरफ़
जब से उस ने खींचा है खिड़की का पर्दा एक तरफ़
उस का कमरा एक तरफ़ है बाक़ी दुनिया एक तरफ़
यूँ तो आज भी तेरा दुख दिल दहला देता है लेकिन
तुझ से जुदा होने के बाद का पहला हफ़्ता एक तरफ़
– तहज़ीब हाफ़ी
दिल मोहब्बत में मुब्तला हो जाए
जो अभी तक न हो सका हो जाए
तुझ में ये ऐब है कि ख़ूबी है
जो तुझे देख ले तिरा हो जाए
ख़ुद को ऐसी जगह छुपाया है
कोई ढूँढे तो लापता हो जाए
मैं तुझे छोड़ कर चला जाऊँ
साया दीवार से जुदा हो जाए
बस वो इतना कहे मुझे तुम से
और फिर कॉल मुंक़ता' हो जाए
दिल भी कैसा दरख़्त है 'हाफ़ी'
जो तिरी याद से हरा हो जाए
– तहज़ीब हाफ़ी
तू ने क्या क़िंदील जला दी शहज़ादी
सुर्ख़ हुई जाती है वादी शहज़ादी
शीश-महल को साफ़ किया तिरे कहने पर
आईनों से गर्द हटा दी शहज़ादी
अब तो ख़्वाब-कदे से बाहर पाँव रख
लौट गए हैं सब फ़रियादी शहज़ादी
तेरे ही कहने पर एक सिपाही ने
अपने घर को आग लगा दी शहज़ादी
मैं तेरे दुश्मन लश्कर का शहज़ादा
कैसे मुमकिन है ये शादी शहज़ादी
– तहज़ीब हाफ़ी
सहरा से आने वाली हवाओं में रेत है
हिजरत करूँगा गाँव से गाँव में रेत है
ऐ क़ैस तेरे दश्त को इतनी दुआएँ दीं
कुछ भी नहीं है मेरी दुआओं में रेत है
सहरा से हो के बाग़ में आया हूँ सैर को
हाथों में फूल हैं मिरे पाँव में रेत है
मुद्दत से मेरी आँख में इक ख़्वाब है मुक़ीम
पानी में पेड़ पेड़ की छाँव में रेत है
मुझ सा कोई फ़क़ीर नहीं है कि जिस के पास
कश्कोल रेत का है सदाओं में रेत है
– तहज़ीब हाफ़ी
न नींद और न ख़्वाबों से आँख भरनी है
कि उस से हम ने तुझे देखने की करनी है
किसी दरख़्त की हिद्दत में दिन गुज़ारना है
किसी चराग़ की छाँव में रात करनी है
वो फूल और किसी शाख़ पर नहीं खुलना
वो ज़ुल्फ़ सिर्फ़ मिरे हाथ से सँवरनी है
तमाम नाख़ुदा साहिल से दूर हो जाएँ
समुंदरों से अकेले में बात करनी है
हमारे गाँव का हर फूल मरने वाला है
अब उस गली से वो ख़ुश्बू नहीं गुज़रनी है
तिरे ज़ियाँ पे मैं अपना ज़ियाँ न कर बैठूँ
कि मुझ मुरीद का मुर्शिद 'उवैस-क़रनी' है
– तहज़ीब हाफ़ी
वैसे मैं ने दुनिया में क्या देखा है
तुम कहते हो तो फिर अच्छा देखा है
मैं उस को अपनी वहशत तोहफ़े में दूँ
हाथ उठाए जिस ने सहरा देखा है
बिन देखे उस की तस्वीर बना लूँगा
आज तो मैं ने उस को इतना देखा है
एक नज़र में मंज़र कब खुलते हैं दोस्त
तू ने देखा भी है तो क्या देखा है
इश्क़ में बंदा मर भी सकता है मैं ने
दिल की दस्तावेज़ में लिखा देखा है
मैं तो आँखें देख के ही बतला दूँगा
तुम में से किस किस ने दरिया देखा है
आगे सीधे हाथ पे एक तराई है
मैं ने पहले भी ये रस्ता देखा है
तुम को तो इस बाग़ का नाम पता होगा
तुम ने तो इस शहर का नक़्शा देखा है
– तहज़ीब हाफ़ी
शोर करूँगा और न कुछ भी बोलूँगा
ख़ामोशी से अपना रोना रो लूँगा
सारी उम्र इसी ख़्वाहिश में गुज़री है
दस्तक होगी और दरवाज़ा खोलूँगा
तन्हाई में ख़ुद से बातें करनी हैं
मेरे मुँह में जो आएगा बोलूँगा
रात बहुत है तुम चाहो तो सो जाओ
मेरा क्या है मैं दिन में भी सो लूँगा
तुम को दिल की बात बतानी है लेकिन
आँखें बंद करो तो मुट्ठी खोलूँगा
– तहज़ीब हाफ़ी
ज़ख़्मों ने मुझ में दरवाज़े खोले हैं
मैं ने वक़्त से पहले टाँके खोले हैं
बाहर आने की भी सकत नहीं हम में
तू ने किस मौसम में पिंजरे खोले हैं
बरसों से आवाज़ें जमती जाती थीं
ख़ामोशी ने कान के पर्दे खोले हैं
कौन हमारी प्यास पे डाका डाल गया
किस ने मश्कीज़ों के तस्मे खोले हैं
वर्ना धूप का पर्बत किस से कटता था
उस ने छतरी खोल के रस्ते खोले हैं
ये मेरा पहला रमज़ान था उस के बग़ैर
मत पूछो किस मुँह से रोज़े खोले हैं
यूँ तो मुझ को कितने ख़त मौसूल हुए
इक दो ऐसे थे जो दिल से खोले हैं
मन्नत मानने वालों को मालूम नहीं
किस ने आ कर पेड़ से धागे खोले हैं
दरिया बंद किया है कूज़े में 'तहज़ीब'
इक चाबी से सारे ताले खोले हैं
– तहज़ीब हाफ़ी
तारीकियों को आग लगे और दिया जले
ये रात बैन करती रहे और दिया जले
उस की ज़बाँ में इतना असर है कि निस्फ़ शब
वो रौशनी की बात करे और दिया जले
तुम चाहते हो तुम से बिछड़ के भी ख़ुश रहूँ
या'नी हवा भी चलती रहे और दिया जले
क्या मुझ से भी अज़ीज़ है तुम को दिए की लौ
फिर तो मेरा मज़ार बने और दिया जले
सूरज तो मेरी आँख से आगे की चीज़ है
मैं चाहता हूँ शाम ढले और दिया जले
तुम लौटने में देर न करना कि ये न हो
दिल तीरगी में घेर चुके और दिया जले
– तहज़ीब हाफ़ी
अश्क ज़ाएअ' हो रहे थे देख कर रोता न था
जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था
सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए
मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था
मुझ पे कितने सानहे गुज़रे पर इन आँखों को क्या
मेरा दुख ये है कि मेरा हम-सफ़र रोता न था
मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं
वो मिरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था
प्यार तो पहले भी उस से था मगर इतना नहीं
तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था
गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए
मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था
– तहज़ीब हाफ़ी
जाने वाले से राब्ता रह जाए
घर की दीवार पर दिया रह जाए
इक नज़र जो भी देख ले तुझ को
वो तिरे ख़्वाब देखता रह जाए
इतनी गिर्हें लगी हैं इस दिल पर
कोई खोले तो खोलता रह जाए
कोई कमरे में आग तापता हो
कोई बारिश में भीगता रह जाए
नींद ऐसी कि रात कम पड़ जाए
ख़्वाब ऐसा कि मुँह खुला रह जाए
झील सैफ़-उल-मुलूक पर जाऊँ
और कमरे में कैमरा रह जाए
– तहज़ीब हाफ़ी
जब किसी एक को रिहा किया जाए
सब असीरों से मशवरा किया जाए
रह लिया जाए अपने होने पर
अपने मरने पे हौसला किया जाए
'इश्क़ करने में क्या बुराई है
हाँ किया जाए बारहा किया जाए
मेरा इक यार सिंध के उस पार
ना-ख़ुदाओं से राब्ता किया जाए
मेरी नक़लें उतारने लगा है
आइने का बताओ क्या किया जाए
ख़ामुशी से लदा हुआ इक पेड़
इस से चल कर मुकालिमा किया जाए
– तहज़ीब हाफ़ी
हम तुम्हारे ग़म से बाहर आ गए
हिज्र से बचने के मंतर आ गए
मैं ने तुम को अंदर आने का कहा
तुम तो मेरे दिल के अंदर आ गए
एक ही औरत को दुनिया मान कर
इतना घूमा हूँ कि चक्कर आ गए
इम्तिहान-ए-इश्क़ मुश्किल था मगर
नक़्ल कर के अच्छे नंबर आ गए
– तहज़ीब हाफ़ी
इस एक डर से ख़्वाब देखता नहीं
मैं जो भी देखता हूँ भूलता नहीं
किसी मुंडेर पर कोई दिया जला
फिर इस के बाद क्या हुआ पता नहीं
अभी से हाथ काँपने लगे मिरे
अभी तो मैं ने वो बदन छुआ नहीं
मैं आ रहा था रास्ते में फूल थे
मैं जा रहा हूँ कोई रोकता नहीं
तिरी तरफ़ चले तो उम्र कट गई
ये और बात रास्ता कटा नहीं
मैं राह से भटक गया तो क्या हुआ
चराग़ मेरे हाथ में तो था नहीं
मैं इन दिनों हूँ ख़ुद से इतना बे-ख़बर
मैं मर चुका हूँ और मुझे पता नहीं
उस अज़दहे की आँख पूछती रही
किसी को ख़ौफ़ आ रहा है या नहीं
ये इश्क़ भी अजब कि एक शख़्स से
मुझे लगा कि हो गया हुआ नहीं
ख़ुदा करे वो पेड़ ख़ैरियत से हो
कई दिनों से उस का राब्ता नहीं
– तहज़ीब हाफ़ी
ये किस ने बाग़ से उस शख़्स को बुला लिया है
परिंद उड़ गए पेड़ों ने मुँह बना लिया है
उसे पता था मैं छूने में वक़्त लेता हूँ
सो उस ने वस्ल का दौरानिया बढ़ा लिया है
ये रात नाम नहीं ले रही थी कटने का
चराग़ जोड़ के लोगों ने दिन बना लिया है
दरख़्त छाओं से हट कर भी और बहुत कुछ है
ये कैसी चीज़ थी और हम ने काम क्या लिया है
खुरच रहा हूँ मैं दीवार पर लिखे हुए नाम
'अजीब तरह की इक बेबसी ने आ लिया है
– तहज़ीब हाफ़ी
शोर करूँगा और न कुछ भी बोलूँगा
ख़ामोशी से अपना रोना रो लूँगा
सारी उम्र इसी ख़्वाहिश में गुज़री है
दस्तक होगी और दरवाज़ा खोलूँगा
तन्हाई में ख़ुद से बातें करनी हैं
मेरे मुँह में जो आएगा बोलूँगा
रात बहुत है तुम चाहो तो सो जाओ
मेरा क्या है मैं दिन में भी सो लूँगा
तुम को दिल की बात बतानी है लेकिन
आँखें बंद करो तो मुट्ठी खोलूँगा
– तहज़ीब हाफ़ी
चीख़ते हैं दर-ओ-दीवार नहीं होता मैं
आँख खुलने पे भी बेदार नहीं होता मैं
ख़्वाब करना हो सफ़र करना हो या रोना हो
मुझ में ख़ूबी है बेज़ार नहीं होता में
अब भला अपने लिए बनना सँवरना कैसा
ख़ुद से मिलना हो तो तय्यार नहीं होता मैं
कौन आएगा भला मेरी अयादत के लिए
बस इसी ख़ौफ़ से बीमार नहीं होता मैं
मंज़िल-ए-इश्क़ पे निकला तो कहा रस्ते ने
हर किसी के लिए हमवार नहीं होता मैं
तेरी तस्वीर से तस्कीन नहीं होती मुझे
तेरी आवाज़ से सरशार नहीं होता मैं
लोग कहते हैं मैं बारिश की तरह हूँ 'हाफ़ी'
अक्सर औक़ात लगातार नहीं होता मैं
– तहज़ीब हाफ़ी
दिल किसी सम्त किसी सम्त क़दम जाता है
तेरे मौजूद के चक्कर में अदम जाता है
और तो कुछ नहीं होता तिरे मिलने से मगर
एक तूफ़ान-ए-त'अल्लुक़ है जो थम जाता है
मुझ को सावन में कभी ख़त न रवाना करना
जाते जाते तिरे मक्तूब से नम जाता है
इस लिए बोला उसे ख़ुद से परे जाने का
जिस तरफ़ हम उसे कहते हैं वो कम जाता है
रक़्स-ए-दोशीज़ा-ए-दुनिया पे नज़र पड़ते ही
जाम-ए-जमशेद मिरे हाथ में जम जाता है
किसी दिल से किसी पहलू से किसी दुनिया से
आदमी जाता है कब रंज-ओ-अलम जाता है
नग़्मा-ए-तूल-ए-शब-ए-हिज्र मिरे बस का नहीं
मैं अगर लय को पकड़ता हूँ तो सम जाता है
हाथ उठा लूँ तो तिरी ख़ुशबू चली जाएगी
सर झटक दूँ तो तिरा दस्त-ए-सितम जाता है
बाज़ औक़ात हवाओं के तआ'क़ुब के लिए
मैं न जाऊँ तो मिरा नक़्श-ए-क़दम जाता है
– तहज़ीब हाफ़ी
तो ये थीं तहज़ीब हाफ़ी की ग़ज़लें। आप कॉमेंट बॉक्स में अपनी पसंदीदा ग़ज़ल मुझसे साझा कर सकते हैं। यदि आप भी शायरी करते हैं तो अपनी भी कोई ग़ज़ल कॉमेंट बॉक्स के ज़रिए मुझ तक पहुँचा सकते हैं। उम्मीद करता हूँ कि आपको तहज़ीब हाफ़ी की ग़ज़लें पसंद आई होंगी।
शुक्रिया।

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