Achyutam Yadav 'Abtar'
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Achyutam Yadav Ghazals
ज़िन्दगी ले गई जिधर मुझ को
बस कराती रही सफ़र मुझ को
इश्क़ की ख़ामियाँ तलाशता हूँ
लग गई आपकी नज़र मुझ को
हम तुम्हारे नसीब में नहीं हैं
चल दिए लोग बोलकर मुझ को
मैं भरोसा करूँगा ख़ुद पर भी
वो भरोसा दिलाए गर मुझ को
मैं कहानी में ख़ूब छाया रहा
पर किया सच ने मुख़्तसर मुझ को
मैंने तूफ़ानों को किया है पस्त
क्या डराएगा इक भँवर मुझ को
याद आने लगी है अपनी मुझे
यार ले आया तू किधर मुझ को
हमसफ़र की तलाश है जानाँ
तुझको तो मिल गया, मगर मुझ को?
– अच्युतम यादव 'अबतर'
जंग में बच न पाया सर मेरा
ख़ुल्द में बन गया है घर मेरा
क्या नफ़ा और क्या ज़रर मेरा
है न जब कोई हम-सफ़र मेरा
ख़ौफ़ में भी जमाल है मेरे
हौसला हो तो परखो डर मेरा
उसने आँखें टिका के क्या देखीं
हो गया दिल इधर-उधर मेरा
उसको मेरी ग़ज़ल पसंद आई
और लहजा तो ख़ास कर मेरा
आज तक मिल सके न ये दोनों
बाप का कंधा और सर मेरा
मेरे यारो मुझे इजाज़त दो
इतना ही था यहाँ सफ़र मेरा
– अच्युतम यादव 'अबतर'
रंज-ओ-ग़म ही दिल में गूँजे तब भी अब भी
रह गए सपने अधूरे तब भी अब भी
ढूँढ लेता मैं ख़िज़ाँ में मौसम-ए-गुल
साथ गर तुम मेरा देते तब भी अब भी
बचपना ऐसा खिलौना है कि जिसको
खो दिया करते थे बच्चे तब भी अब भी
एक मुद्दत हो गई, कोई न आया
आए तो आँसू ही आए तब भी अब भी
तेरी बातों से नहीं लहजे से थे तंग
बातें तो हम मान लेते तब भी अब भी
ख़ूबसूरत कितने हैं रुख़्सार तेरे
थे उफ़ुक़ के रंग जैसे तब भी अब भी
– अच्युतम यादव 'अबतर'
हज़ारों तारे उसे आँख भर के देखते हैं
तमाम झरने जबल से उतर के देखते हैं
हमारे होंठ लरज़ते हैं सामने उनके
सो क्यूँ न नज़रों से ही बात कर के देखते हैं
अबस है सामने उसके सभी की आराइश
अजब हैं आप कि फिर भी सँवर के देखते हैं
हैं उसकी रत्ब सी आँखें इनायत-ए-यज़्दाँ
ये झील क्यों न कभी पार कर के देखते हैं
है उसका चेहरा अगर फूल की तरह नाज़ुक
तो क्यों न तितलियों जैसा ठहर के देखते हैं
ख़बर है बे-रुख़ी की उसकी हम को भी ‘अबतर’
चलो ये राह-ए-ख़लिश से गुज़र के देखते हैं
– अच्युतम यादव 'अबतर'
बात बन न पाएगी चंद ईंटें ढहने से
है अज़ीम महल-ए-ग़म मेरे दिल के रक़्बे से
छोड़ दी है दिल ने ज़िद अब उदास रहने की
और चाहते हैं क्या आप एक बच्चे से
तल्ख़-लहजे से दीवार दरमियाँ उठी थी जो
आख़िरश गिरी भी आज लहजा ही बदलने से
पहले तो नहीं समझा उसकी नफ़रतों को मैं
सरहदें हुईं ज़ाहिर हरकतों के नक़्शे से
हूँ मैं बा-हुनर नक़्क़ाश पर अदक़ है ये ज़िम्मा
इक बदन बनाना है वो भी एक साए से
इन खिलौनों पे ही तो कब से लेटी है 'अबतर'
लाश अपने बचपन की ढूँढ ली है बक्से से
– अच्युतम यादव 'अबतर'
ऐसा उमूमन तो नहीं होता कि जैसा हो गया
मैं अपनी ग़लती मान के भी आज छोटा हो गया
जब सर-ब-सर दिल मेरा यक-दम से तुम्हारा हो गया
तन्हाई का सदमा यकायक ही पुराना हो गया
आईना हैं ग़ज़लें मेरी उसके सँवरने के लिए
मेरा हर इक इक शेर मानो उसका चेहरा हो गया
हालात अपने देख के वो भी परेशाँ रहता है
चाहे वो कितना ही कहे सबसे कि "तो क्या हो गया"
मैं दिल में ऐसी आतिशें लेके चला था उस घड़ी
सूरज ने भी आँखें मिलाईं जब तो अंधा हो गया
– अच्युतम यादव 'अबतर'
जो कुछ मिला मुझको मेरी हाजत से भी आधा मिला
हालाॅंकि ख़ुश हूँ जो मिला उम्मीद से ज़्यादा मिला
सब क़ैद रहना चाहते हैं इश्क़ में वरना मियाँ
पहले नहीं हैं आप जिसको कोई दरवाज़ा मिला
बालीदगी का क़त्ल करके फ़ैसले लेता है वो
तुम नाम की रानी हो तुमको नाम का राजा मिला
मेरे अनोखे इस्तिआरे देखना फिर बोलना
और सबका क्या है, चाँद बोला और छुटकारा मिला
'अबतर' ख़ुद अपने आप को मैंने न जाने खोया कब
इक आदमी तो मुझसे भी ज़्यादा मेरे जैसा मिला
– अच्युतम यादव 'अबतर'
किस आरज़ू को भला आसरा दिया जाए
किसे ख़ुद अपने ही दिल में डुबा दिया जाए
हवा से हार गया जंग जो चराग़-ए-गोर
बग़ल में उसकी भी तुर्बत बना दिया जाए
अगर सँवरना लिखा है बदन के हिस्से में
तो क्यों न रूह को भी आइना दिया जाए
या नर्म-दिल हैं बहुत से बशर या हैं नादान
अब ऐसे मौक़े पे किसको दग़ा दिया जाए
शिकस्त खा रहे हैं दिल की सुनते-सुनते हम
सलाह-कार हमें अब नया दिया जाए
जो क़र्ज़ मानके हर चीज़ लौटा दे 'अबतर'
उस एक शख़्स को तोहफ़े में क्या दिया जाए
– अच्युतम यादव 'अबतर'
Achyutam Yadav Top 5 Sher
थोड़ा सा गँवाता था उन्हें रोज़ मैं 'अबतर'
और रोज़ मुझे थोड़ा गँवाते थे पिता जी
और रोज़ मुझे थोड़ा गँवाते थे पिता जी
– अच्युतम यादव 'अबतर'
ज़िंदगी का हर वरक़ बा-शौक़ पढ़िए
ये किताब इक रोज़ लौटानी भी तो है
– अच्युतम यादव 'अबतर'
हैरान था मैं उसकी ऐसी साहिरी तरकीब से
नफ़रत भी उसने मुझसे की तो की बड़ी तहज़ीब से
– अच्युतम यादव 'अबतर'
कह रहा था मैं नहीं है दुख किसी भी बात का
और छलक के गिर गया इक आँसू पिछली रात का
– अच्युतम यादव 'अबतर'
उम्मीद तो थी कि दिन बदलेंगे अपने कभी
दिन ऐसे बदले कि अब उम्मीद तक भी नहीं
– अच्युतम यादव 'अबतर'
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