Mehshar Afridi
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Ghazal
इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ
लब-ए-साहिल समुंदर की फ़रावानी से मर जाऊँ
ये सोचता हूँ चराग़ों का एहतिमाम करूँ
अना का बोझ कभी जिस्म से उतार के देख
तेरे होंठों के तबस्सुम का तलबगार हूँ मैं
तेरे ख़ामोश तकल्लुम का सहारा हो जाऊँ
मियाँ वो दिन गए अब ये हिमाक़त कौन करता है
छोटे भाई से भी जज़्बात नहीं मिलते हैं
मरज़ के वास्ते इतनी दवा ज़ियादा है
बग़ैर उस को बताए निभाना पड़ता है
अपने ख़ाली-पन को भरना छोड़ दिया
हवा के चलते ही बादल का साफ़ हो जाना
मोहब्बत के नशे में चूर हैं हम
चंद गज़ की शहरियत किस काम की
हर अँधेरा रौशनी में लग गया
ग़म की दौलत मुफ़्त लुटा दूँ बिल्कुल नहीं
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